सागर के अथाह जल में।
एक बाँस भर उग आया है–
चांद, ताड़ के जंगल में।
अगणित उंगली खोल, ताड़ के पत्र, चांदनी में डोले,
ऐसा लगा, ताड़ का जंगल सोया रजत–छत्र खोले
कौन कहे, मन कहाँ-कहाँ
हो आया, आज एक पल में।
बनता मन का मुकुर इंदु, जो मौन गगन में ही रहता,
बनता मन का मुकुर सिंधु, जो गरज–गरज कर कुछ कहता,
शशि बनकर मन चढ़ा गगन पर,
रवि बन छिपा सिंधु–तल में।
परिक्रमा कर रहा किसी की, मन बन चांद और सूरज,
सिंधु किसी का हृदय-दोल है, देह किसी की है भू–रज
मन को खेल खिलाता कोई,
निशि दिन के छाया–छल में।
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