सोच रहा था मैं मन ही मन : ‘हिटलर बेटा’
बड़ा मूर्ख है‚ जो लड़ता है तुच्छ क्षुद्र–मिट्टी के कारण
क्षणभंगुर ही तो है रे! यह सब वैभव धन।
अन्त लगेगा हाथ न कुछ दो दिन का मेला।
लिखूं एक खत‚ हो जा गांधी जी का चेला
वे तुझ को बतलाएंगे आत्मा की सत्ता
होगी प्रगट अहिंसा की तब पूर्ण महत्ता।
कुछ भी तो है नहीं धरा दुनियां के अंदर।
छत पर से पत्नी चिल्लायी : ‘दौड़ो बंदर!’
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