इस अनोखी परंपरा में लड़की का पिता दूल्हे के परिवार के आँगन में घुटनों के बल बैठता है। इसके बाद दुल्हन के पिता को लगभग 20 बार कोड़े मारे जाते हैं। यह सजा उन्हें बेटी को अनुशासन में रखने और उसका पालन-पोषण ठीक ढंग से करने के प्रतीक के रूप में दी जाती है। यह परंपरा चीन के बाओआन जातीय समुदाय से जुड़ी हुई है। हालाँकि, ये कोड़े नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं मारे जाते, बल्कि दूल्हे का परिवार प्रतीकात्मक रूप से दुल्हन के पिता पर कोड़े बरसाता है।
शादी में दुल्हन के पिता को मारे जाते हैं कोड़े
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार बाओआन जातीय समुदाय में इस अनोखी शादी की रस्म को “ससुर को कोड़े मारना” कहा जाता है। यह समुदाय अपनी परंपराओं और विशिष्ट रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है।
बाओआन जातीय समुदाय मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी चीन के गांसू प्रांत में रहता है। इस समुदाय की आबादी लगभग 24,000 है। वे इस्लाम धर्म का पालन करते हैं और चीनी भाषा बोलते हैं। इनके सामाजिक और धार्मिक जीवन में परंपराओं का विशेष महत्व है।
बाओआन समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से इस्लामी त्योहार मनाते हैं और उनकी विवाह-रीति इस्लामी मान्यताओं पर आधारित होती है। वे मुख्य रूप से एकेश्वरवाद का पालन करते हैं। परंपरागत रूप से, विवाह के लिए पुरुषों की आयु 17 वर्ष और महिलाओं की आयु 15 वर्ष मानी जाती थी। शादी की महत्वपूर्ण तारीखें आमतौर पर इस्लामी कैलेंडर के अनुसार तय की जाती थीं।
एक सामान्य बाओआन शादी में चार मुख्य चरण होते हैं। पहला चरण रिश्ते का तय होना होता है। दूसरा चरण शादी की पुष्टि का होता है, जिसमें दुल्हन की कीमत या उपहार तय किए जाते हैं। तीसरा चरण वास्तविक विवाह समारोह का होता है और चौथा चरण शादी के बाद की रस्मों से जुड़ा होता है।
जब दूल्हे का परिवार शादी का प्रस्ताव देता है, तो वे “संगीदान” नामक एक उपहार दुल्हन के परिवार को देते हैं। इस उपहार में मिठाइयाँ, फल, कपड़े, चाय की पत्तियाँ और अन्य सामग्री शामिल होती है। यह सभी उपहार चार अलग-अलग बक्सों में रखे जाते हैं।
यदि दुल्हन का परिवार यह उपहार स्वीकार कर लेता है, तो इसका अर्थ होता है कि दोनों परिवारों के बीच एक औपचारिक समझौता हो गया है और विवाह तय माना जाता है। इसके बाद शादी की तारीख निश्चित की जाती है।
तीन दिन तक चलती है शादी
एक पारंपरिक बाओआन शादी समारोह आमतौर पर तीन दिनों तक चलता है। शादी के दिन, दुल्हन के परिवार की कन्या-दूल्हे के साथ उसके ससुराल जाती है। वहाँ एक विशेष रस्म के तहत दुल्हन का पिता दूल्हे के घर के आँगन में बैठता है और उस पर प्रतीकात्मक रूप से कोड़े बरसाए जाते हैं। इसके बाद दुल्हन की माँ दूल्हे के पिता के चेहरे पर हल्दी का लेप लगाती है, जो दिल से स्वागत और शुभकामनाओं का प्रतीक माना जाता है।
दुल्हन नहीं खाती दूल्हे के घर का खाना
दुल्हन के दूल्हे के घर पहुँचने के बाद मेहमानों को शादी की दावत दी जाती है, लेकिन दुल्हन स्वयं इस भोजन में शामिल नहीं होती। परंपरा के अनुसार, शादी के पहले तीन दिनों तक दुल्हन दूल्हे के परिवार द्वारा बनाया गया कोई भी भोजन नहीं खाती। इस दौरान वह केवल अपने घर से लाई गई सामग्री से बना भोजन ही ग्रहण करती है।
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