विकसित भारत-जी राम जी स्कीम: विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)

विकसित भारत-जी राम जी स्कीम: विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)

‘विकसित भारत जी- राम जी’ बिल में बदला फंडिंग का पैटर्न, MGNREGA को अपग्रेड कर बना ग्रामीण विकास का प्लान: जानें – कैसे राज्य सरकारों की जवाबदेही से अब और तेजी से बढ़ेगा रोजगार

सरकार ने लोकसभा में मनरेगा की जगह नया विकसित भारत जी-राम जी बिल पेश किया है। इस बिल में मजदूरों को तेजी से रोजगार प्रदान कराने का प्रावधान है। फंडिंग पैटर्न में भी बदलाव किए गए हैं।

विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)

सरकार ने लोकसभा में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविक मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G विधेयक या जी राम-जी विधेयक पेश किया है। विधेयक के लोकसभा में पेश होते ही तीखी बहस और हंगामा देखने को मिला। विपक्षण इसका नाम बदलने को लेकर विरोध कर रही है, जबकि सरकार इसे महात्मा गाँधी नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA या मनरेगा) की जगह कई बदलावों के साथ ग्रामीण विकास को नई दिशा देने वाला कदम बता रही है।

लोकसभा में विधेयक पेश करते हुए सरकार ने कहा कि मनरेगा 20 साल पहले बनाई गई योजना है, तब से अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवर्तन हुए हैं। इसीलिए मनरेगा की जगह जी राम-जी विधेयक का प्रस्ताव है, जो विकसित ग्रामीण भारत को ध्यान में रखते हुए लाया गया है। तो ऐसे में नए ‘जी राम-जी’ बिल की खास बातों को गिनाते हुए समझते हैं कि क्या यह नया विधेयक वाकई ग्रामीण भारत को मजबूत करेगा और कैसे यह मनरेगा से बेहतर है?

रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया कैसे होगी तेज और प्रभावशाली?

नए ‘जी राम-जी’ विधेयक में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलने में तेजी और प्रभावशीलता दोनों बढ़ेंगी क्योंकि इसमें मनरेगा की तुलना में कई बदलाव किए गए हैं। सबसे पहले रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिनों तक कर दी गई है, यानी अब हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को साल में 125 दिन मजदूरी का वैध अधिकार मिलेगा, जिससे काम के दिनों और आय दोनों में वृद्धि होगी। इससे गाँवों में ज्यादा दिन काम उपलब्ध किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों को सालभर अधिक आमदनी हो सकेगी।

दूसरा, नए बिल में काम के भुगतान का तरीका भी सुधारा गया है। मजदूरी का भुगतान हफ्ते में एक बार या 15 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य होगा, जिससे मजदूरों को पैसे जल्दी और नियमित तौर पर मिलेंगे और उन्हें लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

इसके अलावा योजना को चार प्रमुख क्षेत्रों – जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़े काम और आपदा-रोधई ढाँचे में विभाजित किया गया है, जिससे कामों की विविधता और गुणवत्ता बढ़ेगी और ग्रामीणों को विभिन्न प्रकार के अवसर मिलेंगे। इसका उद्देश्य है कि अब काम बिखरे हुए नहीं होंगे, बल्कि गाँव की असली जरूरतों के हिसाब से तय किए जाएँगे।

राज्य सरकार की फंडिंग का क्या है नया पैटर्न?

नए जी राम-जी बिल के तहत रोजगार से जुड़ी योजनाओं का खर्च अब केवल केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहेगा। इस नए प्रस्ताव में साफ किया गया है कि राज्य सरकारों को भी रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अपने बजट से पैसा देना होगा। नए बिल में फंडिंग का नया पैटर्न सेट किया गया है।

प्रस्ताव के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघायल, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम), हिमालयी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) में रोजगार से जुड़े कुल खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि 10 प्रतिशत राशि राज्य सरकार को अपने बजट से देनी होगी।

वहीं अन्य सभी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और केरल में रोजगार से जुड़े खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी।

राज्य की साझा फंडिंग से रोजगार में देरी का बहाना कैसे होगा खत्म?

अब रोजगार उपलब्ध कराने में देरी का बहाना खत्म हो जाएगा क्योंकि ‘जी राम-जी’ बिल में फंडिंग की जिम्मेदारी सिर्फ केंद्र सरकार तक सीमित नहीं रखी गई है। पहले मनरेगा में रोजगार के लिए पैसा पूरी तरह से केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इस नई योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकारों की अनिवार्य वित्तीय हिस्सेदारी तय की गई है।

यानी अगर किसी राज्य में रोजगार की माँग बढ़ती है, तो वह यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि केंद्र से पैसा नहीं आया है। राज्यों को भी अपने बजट से तय हिस्सा देना होगा, जिससे फंड की उपलब्धता बनी रहेगी और काम शुरू करने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। सरकार का कहना है कि यह प्रावधान मनरेगा के दौरान सामने आने वाली फंडिंग से जुड़ी अड़चनों को दूर करेगा।

इसके अलावा में फंड जारी करने की समयसीमा और जवाबदेही को भी स्पष्ट रूप से तय किया गया है। केंद्र या राज्य, दोनों में से अगर कोई तय समय पर पैसा जारी नहीं करता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। इससे रोजगार के काम फाइलों में अटकने के बजाए जमीनी स्तर पर जल्दी शुरू हो सकेंगे।

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