ट्रेन में सफ़र करते समय मन में विचार आया।
सफर के दौरान कितने खूबसूरत द्रश्य हमारी आँखों के सामने से गुजर जाते हैं पर हमे उससे कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता! क्यों?
थोडी देर के बाद आँखों के सामने कुछ देर के लिए आते है ऐसे द्रश्य जो हम देखना पसंद नहीं करते मसलन गन्दी नालिया या कचरों के ढेर पर फिर भी हमें उससे कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता! क्यों?
फिर से हरियाली आँखों के सामने आती है। सुबह से श्याम होती है। बाहर के द्रश्य अब दिखने बंध हो जाते है पर उससे भी हमें कुछ फर्क नहीं पड़ता। क्यों?
सामने की सिट पर या बगल वाली सिट पर कुछ लोग आते है। अगले स्टेशन पर उत्तर जाते है। कुछ और बन्दे आते है पर इस सबसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्यों?
क्योकि हमें पता होता है की यह सफर कुछ घण्टों का है, निश्चित समय पर हम अपनी मंजिल तक पहोचेंगे तब हमें ये ट्रेन छोड़नी पड़ेगी। इसिलिये हम ट्रेन का मोह नहीं करते। और इसीलिए ट्रेन में आने वाली किसी भी स्थिति पर हम विचलित नहीं होते।
वैसे ही यह शरीर भी तो एक वाहन ही है! जिसमें बैठ आत्मा जीवन का सफर करती है! एक दिन उसे भी तो अपनी मंजिल मिलते उसे छोड़ना ही है! तो फिर शरीर के इस सफ़र का मुसाफिर क्यों छोटी छोटी बातोें पर विचलित हो जाता है? क्यों?
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