समस्याएँ बढ़ी हैं,
और या कुछ
घटा है सम्मान।
बढ़ रही हैं नित निरंतर,
सभी सुविधाएं,
कमी कुछ भी नहीं है,
प्रचुर है धन धान।
और दिनचर्या वही है,
संतुलित पर हो रहा है
रात्रि का भोजन,
प्रात का जलपान।
घटा है उल्लास,
मन का हास,
कुछ बाकी नहीं
आधे अधूरे काम।
और वय कुछ शेष,
बैरागी हृदय चुपचाप तकता,
अनमना, कुछ क्षीण होती
जिंदगी की शाम।
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