एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया।
घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही
और सब कुछ है वातावरण खो गया।
यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया
गाँव का जो दिया था वचन खो गया।
जो हज़ारों चमन से महकदार था
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया।
दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके
तब पता यह चला, मूलधन ही खो गया।
यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी
यह हमारा तुम्हारा गगन भी अब खो गया।
हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा था कभी
एक गलती से वह व्याकरण भी खो गया।
∼ रामावतार त्यागी
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