लौट उधर से प्रतिध्वनि आती
समझ खड़े समबल प्रतिद्वंद्वी, दे दे अपने प्राण भूकते
रात रात भर श्वान भूकते
इस रव से निशि कितनी विह्वल
बतला सकता हूं मैं केवल
इसी तरह मेरे मन में भी असंतुष्ट अरमान भूकते
रात रात भर श्वान भूकते
जब दिन होता ये चुप होते
कहीं अंधेरे में छिप सोते
पर दिन रात हृदय के मेरे ये निर्दय मेहमान भूकते
रात रात भर श्वान भूकते
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