जागे हुए मिले हैं कभी सो रहे हैं हम - निदा फ़ाजली

जागे हुए मिले हैं कभी सो रहे हैं हम – निदा फ़ाजली

जागे हुए मिले हैं कभी सो रहे हैं हम
मौसम बदल रहे हैं बसर हो रहे हैं हम

बैठे हैं दोस्तों में ज़रूरी हैं क़हक़हे
सबको हँसा रहे हैं मगर रो रहे हैं हम

आँखें कहीं, निगाह कहीं, दस्तो–पा कहीं
किससे कहें कि ढूंढो बहुत खो रहे हैं हम

हर सुबह फेंक जाती है बिस्तर पे कोई जिस्म
यह कौन मर रहा है, किसे ढो रहे हैं हम

शायद कभी उजालों के ऊँचे दरख्त हों
सदियों से आँसुओं की चमक बो रहे हैं हम

~ निदा फ़ाजली

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