घर आ धमके हुरयारे हैं।
मस्तानों की टोली है,
हो हल्ला है, होली है।
मुंह बन्दर सा लाल किसी का,
रंगा गुलाबी भाल किसी का।
कोयल जैसे काले रंग का,
पड़ा दिखाई गाल किसी का।
काना फूसी कुछ लोगों में,
खाई भांग की गोली है।
ढोल ढमाका ढम ढम ढम ढम,
नाचे कूदे फूल गया दम।
उछल रहे हैं सब मस्ती में,
शोर शराबा है है बस्ती में।
कुछ बच्चों ने नल पर जाकर,
अपनी सूरत धो ली है।
छुपे पेड़ के पीछे बल्लू,
पकड़ खींच कर लाये लल्लू।
समझ गए अब बचना मुश्किल,
लगे जोर से हँसने खिल खिल।
गड़बड़िया ने उन्हें देखकर,
रंग की पुड़िया घोली है।
हुरयारों की बल्ले बल्ले,
गुझियां लड्डू और रसगुल्ले।
मजे मजे से खाते जाते,
रंग अबीर उड़ाते जाते।
द्वेष राग की गाँठ बंधी थी,
आज सभी ने खोली है।
~ प्रभुदयाल श्रीवास्तव
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