हम मंडी नहीं जाएंगे
खलिहान से उठते हुए
कहते हैं दाने
जाएँगे तो फिर लौट कर नहीं आएँगे
जाते जाते
कहते जाते हैं दाने
अगर लौट कर आए भी
तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे
अपनी अंतिम चिट्ठी में
लिख भेजते हैं दाने
उसके बाद महीनों तक
बस्ती में
काई चिट्ठी नहीं आती
~ केदार नाथ सिंह
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