अगर पेड़ भी चलते होते - दिविक रमेश

अगर पेड़ भी चलते होते – दिविक रमेश

अगर पेड भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते
बांध तने में उसके रस्सी
चाहे जहाँ कहीं ले जाते

Walking Treeजहाँ कहीं भी धूप सताती
उसके नीचे झट सुस्ताते
जहाँ कहीं वर्षा हो जाती
उसके नीचे हम छिप जाते

लगती भूख यदि अचानक
तोड मधुर फल उसके खाते
आती कीचड-बाढ क़हीं तो
झट उसके उपर चढ ज़ाते

अगर पेड भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते

∼ डॉ. दिविक रमेश

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