Padma Awards: 10 गुमनाम पद्म पुरस्कार नायकों की कहानी

Padma Awards: 10 गुमनाम पद्म पुरस्कार नायकों की कहानी

किसी ने धर्मांतरण से बचाए जनजातीय, किसी ने नक्सली इलाके में भी की समाज सेवा… मोदी सरकार अब असली हकदारों को दे रही ‘पद्म पुरस्कार’, पढ़ें 10 गुमनाम नायकों की कहानी

कॉन्ग्रेस सरकार में जिन गुमनाम नायकों के संघर्ष को दबाया जाता रहा, अब उन्हें मोदी सरकार में पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। इस साल 2026 की सूची में अंके गौड़ा, तेजी गुबिन, कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा, बृज लाल भट्ट, बुधरी ताती जैसे लोग शामिल हैं।

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर साल 2026 के पद्म पुरस्कारों के नामों की घोषणा हो चुकी है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इन नामों पर अपनी औपचारिक मुहर भी लगा दी है। यह वही पल होता है, जब देश उन लोगों को याद करता है, जिन्होंने बिना शोर मचाए अपने काम से भारत को बेहतर बनाया।

अब असली हकदारों को मिला ‘पद्म पुरस्कार’

इस बार पद्म पुरस्कारों के लिए देश-विदेश से 39 हजार से ज्यादा नामांकन आए। इन हजारों नामों में से असली नायकों को चुना गया। इनमें 5 लोगों को पद्म विभूषण, 13 लोगों को पद्म भूषण और 113 लोगों को पद्म श्री दिया जा रहा है। हर साल ये सम्मान खेल, अभिनय, संगीत, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिए जा रहे हैं।

इन 131 नामों के पीछे सिर्फ उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और लगातार समाज के लिए कुछ करने की भावना छिपी है। इस बार की सूची में बड़ी संख्या में जमीनी स्तर पर काम करने वाले गुमनाम लोगों के नाम भी शामिल हैं। इनके योगदान के बारे में जानना जरूरी है, इसीलिए हम आपसे उनकी कहानी साझा करेंगे।

कर्नाटक में मुफ्त लाइब्रेरी चला रहे अंके गौड़ा

कर्नाटक के मंड्या जिले के हरलाहल्ली गाँव के रहने वाले अंके गौड़ा ने अपनी पूरी जिंदगी किताबों को लोगों तक पहुँचाने में लगा दी। अंके गौड़ा पेशे से बस कंडक्टर रहे और बाद में करीब 30 साल तक शुगर फैक्ट्री में काम किया। उनकी आमदनी बहुत सीमित थी, लेकिन उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा किताबें खरीदने में लगा दिया।

Padma Shri award to Anke Gowda for his lifelong service to librarianship
Padma Shri award to Anke Gowda for his lifelong service to librarianship

आज उनकी बनाई हुई मुफ्त लाइब्रेरी में 2 लाख से ज्यादा किताबें हैं, जो 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में हैं। खास बात यह है कि यह लाइब्रेरी पूरी तरह मुफ्त है – न कोई फीस, न सदस्यता, न कोई रोक-टोक। वे सिर्फ किताबें जमा नहीं करते, बल्कि उन्हें सहेजते, वर्गीकृत करते और खुद संभालते हैं। रोजाना उनकी लाइब्रेरी में सैंकड़ों पाठक आते हैं, जिनमें गाँव के बच्चे, कॉलेज छात्र, रिसर्ज स्कॉलर और शिक्षक शामिल हैं।

जनजातीय समाज का धर्मांतरण रोक रहे अरुणाचल के तेची गुबिन

अरुणाचल प्रदेश के शियोमी जिले के केबी गाँव में जन्मे तेची गुबिन की जिंदगी हमेशा अपने समाज और अपनी जड़ों से जुड़ी रही है। पहाड़ी इलाकों में पले-बढ़े गुबिन ने बहुत करीब से देखा कि कैसे बाहरी प्रभाव और लालच की वजह से कई जनजातीय परिवार अपनी पारंपरिक पहचान, रीति-रिवाज और विश्वासों से दूर होकर धर्म परिवर्तन के प्रलोभन में आ रहे हैं।

Arunachal Pradesh Chief Minister Pema Khandu congratulated Techi Gubin, President of the Arunachal Vikas Parishad and former Chief Architect of Arunachal Pradesh, on being conferred the prestigious Padma Shri for his exceptional contribution to social service and lifelong dedication to community welfare.
Arunachal Pradesh Chief Minister Pema Khandu congratulated Techi Gubin, President of the Arunachal Vikas Parishad and former Chief Architect of Arunachal Pradesh, on being conferred the prestigious Padma Shri for his exceptional contribution to social service and lifelong dedication to community welfare.

यही चिंता धीरे-धीरे उनके जीवन का उद्देश्य बन गई। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सरकारी सेवा में गए। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश सरकार में मुख्य वास्तुकार और बाद में हाउसिंग डायरेक्टर जैसे अहम पदों पर सेवाएँ दीं। सरकारी सेवा के दौरान और उसके बाद भी तेची गुबिन ने जनजातीय समाज को धर्मांतरण से होने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक नुकसान के बारे में जागरूक करने का काम किया।

वे लगातार गाँव-गाँव जाकर लोगों से बात करते रहे और समझाते रहे कि धर्म बदलने से सिर्फ आस्था ही नहीं बदलती, बल्कि पूरी पद्धति, संस्कृति और सामाजिक ढाँचा प्रभावित होता है। उन्होंने जनजातीय समुदायों को उनकी मूल परंपराओं, लोक आस्थाओं और सामाजिक एकता से जोड़े रखने के लिए कई सामाजिक मंचों और संगठनों के साथ मिलकर काम किया।

इसी क्रम में ने अरुणाचल विकास परिषद और अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से भी सक्रिय रूप से जुड़े, जहाँ उनका फोकस लोगों को आत्मसम्मान और अपनी पहचान पर गर्व का भाव देना रहा। साल 2024 में सेवानिवृत्ति के बाद भी वे पूरी तरह समाजसेवा में लगे रहे। उनके काम की पहचा पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर बनी, जब उन्हें ‘माय होम इंडिया’ और ‘वन इंडिया अवार्ड’ जैसे सम्मान से नवाजा गया।

‘वन की माँ’ बन चुकी केरल की कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा

केरल के छोटे से इलाके अलप्पुझछा में 92 साल की कोल्लक्कयिल देवकी अम्मा की जिंदगी एक साधारण महिला से बदलकर ‘वन की माँ’ की पहचान बन चुकी है। उन्होंने अपने पुस्तैविला (Puthiyaviala) मकान के चारों ओर की 4.5 एकड़ बंजर जमीन को एक घने, हरित जंगल में बदल दिया है, जिसे आच लोग ‘तपोवनम्’ (Tapovanam) के नाम से जानते हैं।

Devaki Amma, a 92-year-old environmentalist from Alappuzha in Kerala, has emerged as one of the first names noticed in the Padma Awards 2026 list Read more at: https://english.mathrubhumi.com/news/kerala/padma-awards-2026-devaki-amma-alappuzha-hg79e2xg
Devaki Amma, a 92-year-old environmentalist from Alappuzha in Kerala, has emerged as one of the first names noticed in the Padma Awards 2026 list Read more at: https://english.mathrubhumi.com/news/kerala/padma-awards-2026-devaki-amma-alappuzha-hg79e2xg

इस जंगल में अब 3000 से अधिक पेड़ और पौधे बढ़ चुके हैं, जिनमें कई आयुर्वेदिक, दुर्लभ और क्षेत्रीय प्रजातियाँ शामिल हैं और यह सब उन्होंने लगभग 44 सालों में खुद के हाथों से लगाए, सींचे और बचाए हैं। आज यह जंगल पक्षियों, कीड़ों, छोटे जीवों और स्थानीय लोगों के लिए एक इको-सिस्टम के रूप में काम कर रहा है।

देवकी अम्मा की कहानी 1980 में हुए एक गंभीर कार हादसे से शुरू होती है, जब वे खेतों में काम नहीं कर पाई और खेती से दूर हो गई। उस कठिन समय में उन्होंने अपने घर के आसपास जो एक छोटी-सी जमीन थी, वहाँ पहला पौधा लगाया। उस एक पौधे ने उनके मन में प्रकृति के लिए गहरा लगाव पैदा किया और उन्होंने हर रोज कम से कम एक पौधा लगाने का संकल्प लिया।

धीरे-धीरे यह काम बढ़ता गया और 4 दशकों में ‘तपोवनम्’ नाम का जंगल तैयार हो गया, जिसमें आम, जामुन, नारियल, औषधीय जड़ी बूटियाँ और दुर्लभ पेड़ भी मौजूद हैं। इस जंगल में तालाब, मछलियाँ और कई पक्षी प्रजातियाँ भी पनपी हैं, जिससे यह एक जीवित पारिस्थितिकी स्थल बन चुका है। देवकी अम्मा का यह काम सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने एक जीवित पर्यावरणीय शिक्षा स्थल भी तैयार किया है, जहाँ स्थानीय बच्चे, छात्रों और पर्यावरण प्रेमी आते हैं और बायोडायवर्सिटी, पौधों की प्रजातियाँ और पारिस्थितिक संतुलन के बारे में सीखते हैं।

कश्मीरी पंडितों के लिए संगीत की पाठशाला लगाने वाले बृज लाल भट्ट

कश्मीर की घाटी में जन्मे बृज लाल भट्ट ने बहुत कम उम्र में यह समझ लिया था कि संगीत सिर्फ सुर-ताल नहीं होता, बल्कि एक पूरी संस्कृति की आत्मा होता है। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से जब सूफियाना कलाम, वाख, भजन और पारंपरिक लोक धुने जैसे कश्मीरी लोक संगीत नई पीढ़ी से दूर होती जा रही थीं, तब भट्ट ने तय किया कि वे इस विरासत को अगली पीढ़ी तक जिंदा रखेंगे।

1990 के दशक में जब कश्मीरी पंडितों पर आतंकवाद का साया मंडरा रहा था, तब बृज लाल भट्ट ने न सिर्फ संगीत को जिंदा रखा, बल्कि कश्मीरी संस्कृति, भाषा और भावनाओं को अपने सुरों के जरिए बचाए रखा।
1990 के दशक में जब कश्मीरी पंडितों पर आतंकवाद का साया मंडरा रहा था, तब बृज लाल भट्ट ने न सिर्फ संगीत को जिंदा रखा, बल्कि कश्मीरी संस्कृति, भाषा और भावनाओं को अपने सुरों के जरिए बचाए रखा।

उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कश्मीरी पंडित बच्चों और युवाओं को संगीत सिखाने में लगा दिया। चाहे मंदिर परिसर हो, सामुदायिक सभाएँ हो या छोटे-छोटे घरों के कमरे। उन्होंने हर जगह को ‘संगीत की पाठशाला’ बना दिया। वे सिर्फ गाना नहीं सिखाते थे, बल्कि हर रचना के पीछे की कहानी, उसका धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ भी समझाते थे।

बृज लाल भट्ट के लिए संगीत प्रतिरोध नहीं, बल्कि पुनर्निमाण का रास्ता था। उन्होंने बिना शोर किए, बिना मंच की तलाश किए, चुपचाप एक पूरी परंपरा को संभाले रखा। जब हालात ने कश्मीरी पंडित समाज को बिखेर दिया, तब संगीत ही वह डोर बना, जिसने पहचान को टूटने नहीं दिया। आज उन्हें कश्मीरी लोक संगीत का संरक्षक इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सुरों के जरिए एक समुदाय को उसकी यादों, आस्था और संस्कृति से जोड़े रखा।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अलख जगा रहीं बुधरी ताती

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के हिरानार गाँव की रहने वाली बुधरी ताती पिछले 36 सालों से देश के सबसे कठिन इलाकों में समाज सेवा कर रही हैं। उन्हें लोग प्यार से ‘बड़ी दीदी’ कहते हैं क्योंकि उन्होंने न सिर्फ समाज की जरूरतों को पहचाना, बल्कि खुद आगे आकर उन्हें पूरा भी किया।

बुधरी ताती को बस्तर इलाके में बड़ी दीदी के नाम से पुकारा जाता है। बुधरी ताती ने अपने जीवन के 40 साल सामाजिक सेवा में बिताए हैं।
बुधरी ताती को बस्तर इलाके में बड़ी दीदी के नाम से पुकारा जाता है। बुधरी ताती ने अपने जीवन के 40 साल सामाजिक सेवा में बिताए हैं।

बुधरी ताती की सेवा की शुरुआत 1984 में हुई, जब उन्होंने बस्तर के नक्सल प्रभावित वनांचल इलाकों में कदम रखा और महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के जीवन को बदलने का काम शुरू किया। उन्होंने 500 से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद की, जिनमें से कई आज अपनी आजीविका स्वयं चला रही हैं।

ताती ने साक्षरता अभियान, सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम, स्वास्थ्य और साफ-सफाई की पहल चलाई और पहाड़ों व जंगलों के गाँवों में शिक्षा की पहुँच को मजबूत किया। उनके प्रयासों की वजह से कई महिलाएँ नर्सिंग और स्थानीय सेवाओं में काम कर रही हैं, जिससे समुदाय में सकारात्मक बदलाव आया है।

बता दें कि इन 5 नामों के अलावा पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने वाले बाकी लोग हैं:

आर्मिडा फर्नांडीज: मुंबई की पीडियाट्रिशियन अरमिडा फर्नांडीस ने एशिया का पहला ह्यूमन मिल्क बैंक बनाया।

पुन्नियमूर्ति नटेसन: तमिलनाडु के पशु चिकित्सक पुन्नियमूर्ति नटेसन ने जानवरों के इलाज के लिए पारंपरिक दवा का इस्तेमाल आधुनिक विज्ञान के साथ किया।

धर्मिकलाल चुनीलाल पंड्या: गुजरात की पारंपरिक लोककला ‘मानभट्ट’ को बचाने और आगे बढ़ाने में योगदान।

के पाजनिवेल: पारंपरिक तमिल मार्शल आर्ट ‘सिलम्बम’ के प्रशिक्षक रहकर इस कला को लोकप्रिय बनाया।

कैलाश चंद्र पंत: पत्रकार और समाजसेवी, जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति लोगों को जागरूक किया।

मोदी सरकार में असली हकदार को मिला पुरस्कार, कॉन्ग्रेस ने ‘खास’ को दिया

इन नामों को सुन लोग कह रहे हैं कि पुरस्कार के असली हकदारों को अब जाकर सम्मान मिलना शुरू हुआ है वरना पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस तरह दूर दराज शहरों में कलाओं को संजोने वाली हस्तियों को इतने बड़े पुरस्कार से सम्मान मिलेगा। कॉन्ग्रेस के शासन काल में तो उन्हें ही सम्मान मिलता था जो उनके खास होते थे। खुद कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी इस बात को माना है।

साल 2023 मोदी सरकार ने शाह रशीद अहमद कादरी ने पद्म पुरस्कार पाने के बाद कहा था, “मैं शुरू से कॉन्ग्रेसी था… पाँच साल यूपीए शासन में उम्मीद की कि मुझे ये सम्मान मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीजेपी सरकार आई। हमें लगा ये हमें क्यों देंगे लेकिन ख्याल गलत था। उन्होंने मुझे चुना। बहुत-बहुत धन्यवाद।”

पद्मश्री पाने वाले सुपर 30 के आनंद कुमार, जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को मुफ्त में आईआईटी प्रवेश परीक्षा की ट्रेनिंग देते हैं, उन्होंने तो यहाँ तक कहा था कि जब सरकार ने उन्हें सम्मानित करने की सूचना दी तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उन्होंने

ऐसे ही कर्नाटक के वरिष्ठ नेता प्रमोध माधवराज ने भी 2021 में पद्म पुरस्कारों को लेकर जो मोदी सरकार ने ट्रेंड बदला उसकी तारीफ की थी। उन्होंने कहा था- नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे पुरस्कार उन लोगों को मिल रहे हैं जो इसके हकदार हैं। उन्होंने कहा था कि अनुकरणीय कारनामों के साथ जमीनी स्तर पर उपलब्धि हासिल करने वालों की पहचान करना और उन्हें पुरस्कार देना एक अच्छी शुरुआत है। उन्होंने ये भी कहा था- “मैं दूसरी पार्टी से हूँ लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी की इस ट्रेंड को बदलने के लिए तारीफ करूँगा।”

मोदी सरकार में अनसुनी कहानियों को मिली पहचान, बदली प्रक्रिया

गौरतलब है मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद पद्म पुरस्कार पाने की प्रक्रिया में बदलाव किया था। पहले जहाँ ये अवार्ड केवल उन लोगों को मिलते थे जो इसके लिए अप्लाई करते थे। उस प्रक्रिया में केवल उन लोगों का नाम आ पाता था जिन्हें अवार्ड के बारे में पता होता था और जानकारी होती थी कि इसका कब नामांकन करना है, कहाँ उसे जमा कराना है, क्या सोर्स लगानी है आदि-आदि… ये सब बिंदु मिलकर निर्धारित करते थे कि किसका नाम UPA शासन में पद्म पुरस्कार के लिए घोषित होगा। इस प्रक्रिया में उन लोगों को अवार्ड ज्यादा मिलता था जो सरकार के करीबी होते थे, वहीं असली संघर्ष करने वाले गुमनाम ही रह जाते थे।

मोदी सरकार जब आई तो उन्होंने इन पुरस्कारों की महत्ता को समझते हुए इन्हें उन हस्तियों तक पहुँचाना शुरू किया जो वाकई जमीनी स्तर पर समाज में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं मगर उनकी सिफारिश करने वाला कोई नहीं है, उन्हें ये भी नहीं पता है कि पद्म अवार्ड लेने के लिए क्या प्रक्रिया है।

मोदी सरकार ने इस सिस्टम को सुधारने के लिए सबसे पहले नामांकन की प्रक्रिया को पारदर्शी किया। उन्होंने ऑनलाइन नॉमिनेशन शुरू किया जिसमें कोई भी व्यक्ति किसी भी शख्स को उसके कार्यों के लिए नामित कर सकता था। इस प्रक्रिया से फायदा ये हुआ कि वो नाम भी सामने आए जिनके संघर्ष की कहानी लोगों तक नहीं थी। इससे सामान्य जन की इसमें भागीदारी बढ़ी और पद्म पुरस्कार पाकर हस्तियों ने पीएम मोदी का धन्यवाद किया।

लिस्ट उठाकर यदि देखें तो पता चलेगा कि 2016 के बाद से अब तक मोदी सरकार में कई ऐसे लोग सम्मानित हुए हैं जिन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि उनके कार्यों के लिए उन्हें कोई पूछेगा। विलुप्त होती कलाओं को संरक्षित करने वालों को इस सम्मान से उत्साह भी बढ़ता है और उन्हें उनके मूल्य का एहसास भी हो पाता है।

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