तितली की लय में असम की सांस्कृतिक आत्मा: जानें- पारंपरिक ‘बागुरुम्बा दोहो’ नृत्य का इतिहास, जिसका वीडियो PM मोदी ने किया शेयर
बागुरुम्बा नृत्य में संगीत की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी नृत्य की। बोडो समुदाय के पारंपरिक वाद्य यंत्र इसकी आत्मा माने जाते हैं। सिफुंग, जो लंबी बांसुरी जैसी होती है, गहरे और मधुर स्वर पैदा करती है। सेरजा, जो देखने में वायलिन जैसी लगती है, नृत्य में भावनात्मक गहराई जोड़ती है।
Bagurumba Dwhou: बागुरुम्बा दोहो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया असम दौरा केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं बल्कि असम की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसकी जनजातीय विरासत को राष्ट्रीय फलक पर प्रतिष्ठित करने का सांस्कृतिक उत्सव बनकर सामने आया। गुवाहाटी पहुँचने पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा स्वागत और इसके बाद प्रधानमंत्री का भव्य रोड शो तथा ‘बागुरुम्बा दोहो’ सांस्कृतिक उत्सव में शामिल होना असम की जनजातीय परंपराओं, विशेषकर बोडो समाज की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का प्रतीक बना।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में साफ कहा कि असम की कला और संस्कृति को देश-दुनिया में पहचान दिलाना उनकी प्राथमिकता रही है। प्रधानमंत्री ने बागुरुम्बा नृत्य की छवियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा कर यह संदेश दिया कि असम की संस्कृति सीमाओं में बंधी नहीं बल्कि विश्व पटल पर पहचान पाने की क्षमता रखती है। ऐसे में बागुरुम्बा नृत्य और उसके सांस्कृतिक मूल्यों को समझना अधिक अर्थपूर्ण हो गया है क्योंकि यह नृत्य केवल कला नहीं बल्कि असम की आत्मा की लय है।
बागुरुम्बा नृत्य की उत्पत्ति और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
बागुरुम्बा असम और पूर्वोत्तर भारत के बोडो समुदाय का पारंपरिक लोकनृत्य है। इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के जरिए आगे बढ़ाया गया है। यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि बोडो समाज के जीवन, विश्वास और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध का प्रतिबिंब है।
बागुरुम्बा को अक्सर ‘तितली नृत्य’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें नर्तकियों की मुद्राएँ और कोमल गतियाँ तितली के उड़ने जैसी प्रतीत होती हैं। यह नृत्य बोडो पहचान का एक मजबूत प्रतीक बन चुका है और समय के साथ इसमें बदलाव आते हुए भी इसकी आत्मा आज तक सुरक्षित है।
ब्विसागु पर्व और बागुरुम्बा का संबंध
बागुरुम्बा नृत्य मुख्य रूप से बोडो नववर्ष के अवसर पर मनाए जाने वाले ब्विसागु पर्व से जुड़ा है। यह पर्व अप्रैल के मध्य में, विषुवा संक्रांति के आसपास मनाया जाता है और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है।
ब्विसागु की शुरुआत गायों की पूजा से होती है, इसके बाद युवा अपने माता-पिता और बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। इस दौरान बाथौ देवता की पूजा की जाती है, जिन्हें सिजू पौधे के प्रतीक रूप में माना जाता है। बागुरुम्बा नृत्य इसी धार्मिक और सामाजिक वातावरण में प्रस्तुत किया जाता है, जहाँ उल्लास, श्रद्धा और सामूहिकता एक साथ दिखाई देती है।
नृत्य की शैली, वेशभूषा और प्रतीकात्मकता
बागुरुम्बा नृत्य की शैली सरल लेकिन अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। इसे आमतौर पर युवा महिलाएँ समूह में प्रस्तुत करती हैं। नर्तकियाँ रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं, जिनमें डोखना, ज्वमग्रा (या फासरा) और अरोनाई प्रमुख हैं।
कंधों पर डाले गए कपड़े को दोनों हाथों से पकड़कर नृत्य करते समय उसे तितली के पंखों की तरह फैलाया जाता है। पीले, हरे और लाल रंग प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। धीमे कदम, फैले हुए हाथ और लयबद्ध गतियाँ इस नृत्य को सौम्य और आकर्षक बनाती हैं, मानो प्रकृति स्वयं उसमें जीवंत हो उठी हो।
संगीत और वाद्य यंत्रों की भूमिका
बागुरुम्बा नृत्य में संगीत की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी नृत्य की। बोडो समुदाय के पारंपरिक वाद्य यंत्र इसकी आत्मा माने जाते हैं। सिफुंग, जो लंबी बांसुरी जैसी होती है, गहरे और मधुर स्वर पैदा करती है। सेरजा, जो देखने में वायलिन जैसी लगती है, नृत्य में भावनात्मक गहराई जोड़ती है।
खाम एक लंबा ढोल है, जिसे लकड़ी और चमड़े से बनाया जाता है और यह ताल को गति देता है। इसके अलावा थारखा, जो दो बाँस के टुकड़ों से बना होता है, जोटा जैसे लोहे के वाद्य और गोंगना जैसे बाँस आधारित वाद्य भी प्रयोग में लाए जाते हैं। इन सभी के सामूहिक स्वर से नृत्य जीवंत हो उठता है।
आधुनिक समय में बागुरुम्बा और ‘बागुरुम्बा दोहो’
समय के साथ बागुरुम्बा नृत्य में कुछ परिवर्तन आए हैं। आज यह दो रूपों में देखने को मिलता है, एक संगीत के साथ और दूसरा बिना संगीत के। स्कूलों, कॉलेजों और सांस्कृतिक मंचों पर भी यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है, जिससे नई पीढ़ी भी इससे जुड़ी रहे।
कोकराझार, बोंगाईगाँव, नलबाड़ी, दर्रांग और सोनितपुर जैसे बोडो बहुल जिलों में इसका विशेष महत्व है। ‘बागुरुम्बा दोहो’ जैसे बड़े आयोजन, जहाँ हजारों कलाकार एक साथ प्रस्तुति देते हैं, इस बात का संकेत हैं कि पारंपरिक कला रूपों को संरक्षित करने और मुख्यधारा में लाने के प्रयास तेज हो रहे हैं।
PM मोदी की मौजूदगी में हुआ यह आयोजन न केवल असम बल्कि पूरे देश के लिए सांस्कृतिक एकता और विविधता का संदेश देता है। बागुरुम्बा नृत्य केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि बोडो समाज की आत्मा, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन दर्शन का प्रतीक है।
प्रधानमंत्री मोदी के असम दौरे और ‘बागुरुम्बा दोहो’ जैसे आयोजनों ने इस परंपरा को नई पहचान दी है। यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों तक इस सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाएँगे और असम की विविध संस्कृति को विश्व पटल पर और मजबूती से स्थापित करेंगे।
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