1947 में रावलपिंडी के तोहा खालसा में 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने क्यों किया जौहर

1947 में रावलपिंडी के तोहा खालसा में 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने क्यों किया जौहर

स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियाँ जिन्होंने आत्मसम्मान बचाने के लिए सैकड़ों जगह ऐसे जौहर किए और एक बार नहीं बल्कि बार-बार किए। उन्होंने अपने ही पिता, पति और भाइयों के हाथों अपनी गर्दनें कटवा दी, अग्निकुंडों में राख बन गई, पानी में डूब गई, लेकिन जिहादियों के क़ब्ज़े में जाना कभी स्वीकार नहीं किया।

कल्पना कीजिये उस इंडिया की, जो पार्टीशन के पहले का अनडिवाइडेड भारतवर्ष है। उस भारत का पंजाब और उस पंजाब के रावलपिंडी का एक गाँव। गाँव के ठीक बीच में मौजूद एक कुएँ के चारों तरफ कई स्त्रियाँ खड़ी थी, जिनमें ज्यादातर सिख और कुछ हिंदू थी। ये एक ऐसा दौर था जब गाँव के कुएँ और तालाब महिलाओं के लिए बेस्ट हैंगआउट प्लेस हुआ करते थे।

कुएँ में कूदने की जगह नहीं बची तो रोने लगीं हिंदू महिलाएँ: जानिए- 1947 में रावलपिंडी के तोहा खालसा में 90 हिंदू-सिख महिलाओं ने क्यों किया ‘जौहर’

यहाँ वो अपने रोज के कामों के साथ-साथ अपनी सहेलियों से मिलती-जुलती थी और तरह-तरह की बातें किया करती थी। कभी सास-ससुर की शिकायतें तो कभी मायके की यादें, कभी हंसी-मजाक तो कभी सुख-दुःख की बातें और जवान लड़कियाँ, किसी कुएँ की दीवार पर बैठकर अपने विवाह के सपने बुना करती थी।

लेकिन आज यहाँ ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा था, आज का दिन कुछ और था वो यहाँ कुछ ऐसा करने जा रही थी जिसकी शायद आज कोई कल्पना भी ना कर पाए। पानी से लबालब भरे हुए उस कुएंँ में अचानक एक स्त्री छलांग लगाती है और वो डूबने लगती है। उसके फेफड़ों में पानी भरने लगता है।

दम घुटने से वो छटपटाती है, हाथ-पैर मारती है, फिर थोड़ी देर बाद पानी में हवा के बुलबुले उठने लगते हैं और वो कुएँ की गहराई में गुम हो जाती हैं। हैरानी की बात ये कि वहाँ खड़ी बाक़ी स्त्रियों ने भी उसे कूदने से नहीं रोका था। ऊपर से इतना भयंकर दृश्य देखकर भी ऊपर खड़ी अन्य स्त्रियाँ घबराती नहीं हैं बल्कि एक के बाद एक वो सब भी उस कुएँ में कूदकर डूबती जाती हैं।

अंत में वहाँ केवल तीन स्त्रियां बच जाती हैं। वो रोती हैं, बिलखती हैं, छातियाँ पीटती हुई रो रही होती हैं। क्या आप जानते हैं कि वो तीनों रो क्यों रही थी? अगर आपको लग रहा हो कि वो इसलिए रो रही होंगी कि उनकी सहेलियाँ डूबकर मर चुकी हैं तो ऐसा नहीं था, वो इसलिए रो रही थीं क्योंकि कुआँ लाशों से पूरा भर चुका था और वहाँ अब उनके डूबने लायक ना तो पानी बचा हुआ था और ना ही जगह। वो इसलिए अपनी छातियाँ पीट रही थी क्योंकि वो मर नहीं पाई थी

ये सत्य घटना है रावलपिंडी के एक गांँव तोहा खालसा की, साल था 1947, मार्च का महीना, जब देश को आजादी नहीं मिली थी, ना ही मजहब के नाम पर भारत का बँटवारा हुआ था। Horrors of partitions, जिसके बारे में हम अक्सर सुनते हैं, मुसलमानों ने उसका ट्रेलर भारत की आज़ादी और भारत के पार्टीशन के एक साल पहले ही दिखाना शुरू कर दिया था।

मुहम्मद अली जिन्ना की पार्टी मुस्लिम लीग को पूरे भारत के मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाने के लिए भर-भरकर वोट दिए और जिन्ना के आदेश पर 16 अगस्त 1946 के बाद पूरे देश में मुसलमानों ने जिहाद छेड़ा हुआ था। इसलिए अगर आपको लगता है कि हिंदुओं पर हिंसा का कहर केवल पार्टीशन के बाद ही टूटा था तो ये सच नहीं है।

हिंदुओं का ये नरसंहार विभाजन से बहुत पहले शुरू हो चुका था। और उसी के चलते, रावलपिंडी के तोहा खालसा गाँव में जो होने जा रहा था वो ख़िलजी और मुग़लों के बाद जिन्ना के दौर में हिंदू और सिख महिलाओं का एक अलग तरह का जौहर था।

ये ऐसा जौहर था जो अग्निकुंडों में नहीं बल्कि जलकुंडों में किया गया था। और आप ये अंदाजा मत लगाइए कि ये केवल एक गांव की कहानी होगी बल्कि जिहादी क्रूरता के इस दौर में सैकड़ों गाँवों में हिंदू और सिख स्त्रियों ने ऐसे जौहर किए। ये घटनाएँ कोई ख़िलजी या मुग़लों के दौर की नहीं हैं बल्कि इतनी रीसेंट हैं कि इनके आईविटनेस भी अभी ज़िंदा हैं।

इतिहास की दराजों में जौहर की ऐसी हजारों कहानियाँ हैं लेकिन इस वीडियो में हम बात करेंगे रावलपिंडी के तोहा खालसा गाँव की, ये वो दौर था जब पूरे देश में मुसलमान हिंदुओं पर वैसे ही बर्बर अत्याचार कर रहे थे जैसे ख़िलजी और मुग़लों के समय हुआ करते थे।

जिहाद के इस खुले ख़ूनी खेल में मर्द तो एक झटके में काट दिए जाते थे लेकिन हिंदू स्त्रियों की ऐसी दुर्दशा की जा रही थी जिसे देखकर शैतान भी काँप उठे।

लाशों से भर गया था कुआँ

जिहादी भेड़ियों की Modus operandi एक ही रहती थी, पहले किसी हिंदू या सिख गाँव को टारगेट और फिर हजारों की भीड़ लेकर गाँव में घुसना। फिर जो हिंदू, जहाँ मिले, उसे वहीं पर काट देना। छोटे-छोटे बच्चों को, माताओं की गोद से छीनकर आग में फेंक देना, हवा में उछलकर तलवारों और भालों से बेधना।

पहले हिंदू और सिख स्त्रियों की नग्न परेड करवाना और फिर सैकड़ों जिहादियों द्वारा बारी-बारी से उनका रेप किया जाना। अंत में तलवारों से उनकी छातियाँ, नाक और कान काट देना। उन हैवानों की हवस ऐसी थी कि गर्भवती महिलाओं तक को नहीं बख्शा जाता था। रेप करने के बाद उनका पेट चीरकर नवजातों को सड़कों पर फेंक दिया जाता था।

खैर, अब डिटेल में बात करते हैं उस घटना के बारे में, जो हमने इस वीडियो के शुरू में बताई। रावल पिंडी का गाँव तोहा खालसा। तारीख़ थी 12 मार्च, साल 1947। जिहादियों की ऐसी ही एक भीड़ रावलपिंडी के तोहा खालसा गांव को घेर लेती है।

गाँव के हिंदू और सिखों के पास दो बंदूकें थी जिनकी मदद से वे कुछ देर जिहादियों से लड़ते रहे लेकिन हजारों की भीड़ के आगे वे कब तक टिक पाते? जब उनकी गोलियाँ समाप्त हो गई तो जिहादियों से संघर्ष रोकने के लिए अपने घरों के आगे सफेद झंडे लगा दिए।

जिहादी भीड़ ने उनकी जान बक्श ने के लिए 10 हज़ार रुपए की डिमांड रखी जिसे तुरंत पूरा कर दिया गया। पैसे मिलने के बाद मुसलमानों की भीड़ ये कहते हुए लौट गई कि वो अब दोबारा नहीं आएँगे, लेकिन दूसरे ही दिन वे फिर से लौटे और अधिक भयानक और खूँखार भेड़िए बनकर।

जिहादी जानते थे कि अब गाँववालों के पास पैसा नहीं बचा है इसलिए इस बार उन्होंने पैसा नहीं माँगा बल्कि सीधे ही मार-काट मचाना शुरू कर दिया। ऐसा लग रहा था जैसे वो शैतान काफ़िरों के ख़ून से ईद मना रहे थे। जहाँ तक संभव था हिंदू और सिख पुरुष लड़े, लेकिन हजारों इस्लामी भेड़ियों के आगे वो निहत्थे कब तक टिकते।

एक-एक करके लाशें गिरने लगी, एक तरफ़ कलमा पढ़ा जा रहा था तो दूसरी तरफ़ नंगी तलवारें चमक रही थी। जिन्हें अपनी जान बचानी थी उनके लिए कलमा पढ़कर और रक्त चूता हुआ गोमांस का टुकड़ा खाकर मुसलमान बनने का ऑप्शन रखा गया था।

जिन्हें ये मंजूर नहीं था उनके लिए नंगी तलवारें इंतजार कर रही थी। बहादुर और धर्म के पक्के हिंदू और सिख पुरुषों ने ख़ुशी से तलवारों के नीचे अपनी गर्दनें रख दी। सिरों के ढेर लग गए, ख़ून की नदियाँ बहने लगी। अब स्त्रियों की बारी थी। उन्हें बचाने वाले पुरुष जब काट दिए गए तो उन्होंने समझ लिया कि अब बचाव संभव नहीं है।

Thoha Khalsa is a village in the Kahuta 30 miles from Rawalpindi: The village was inhabited by wealthy Sikh families - Bindras, Duggals, Anands and Chandhoks
Thoha Khalsa is a village in the Kahuta 30 miles from Rawalpindi: The village was inhabited by wealthy Sikh families – Bindras, Duggals, Anands and Chandhoks

इसलिए उन्होंने वही रास्ता चुना जो कभी रानी पद्मिनी सहित लाखों हिंदू स्त्रियों ने चुना था। जिहादी हैवानों के हाथ आने से अच्छा उन्होंने ख़ुद ही अपने प्राण ले लेना उचित समझा। ख़िलजी-मुग़लों के दौर में हिंदू स्त्रियों ने अग्निकुंडों में कूदकर जौहर किया था लेकिन इस बार रास्ता थोड़ा अलग था।

जिहादियों ने डिमांड रखी थी कि अगर काफ़िर अपनी महिलाओं को उन्हें सौंप देते हैं तो वो उनकी जान बख़्श देंगे। लेकिन स्वाभिमानी हिंदू और सिख ये कैसे स्वीकार कर सकते थे? हजारों की संख्या में हिंदू और सिख स्त्रियों ने जिहादियों के हाथों नोचे जाने से बेहतर अपने ही परिवार के मर्दों से अपनी गर्दनें कटवा ली। जौहर का यह नया स्वरूप था।

जब जिहादी भीड़ गाँव में नरसंहार कर रही थी तब तोहा खालसा की 93 स्त्रियाँ गाँव के एक पुराने कुएँ पर इकट्ठा हुई। सबने थोड़ी देर आँखें बंद की और अपनों को याद किया। इसके बाद पहले एक महिला कूदी, उसके पीछे दूसरी, फिर तीसरी और देखते ही देखते पूरा कुआँ 90 स्त्रिओं की लाशों से भर गया।

इसमें केवल 3 महिलाएँ ही ज़िंदा बची और वो भी इसलिए क्योंकि कुएँ में अब डूबने लायक पानी ही नहीं बचा था।

The events at Thoa Khalsa during the March 1947 Rawalpindi massacres remain one of the most painful and haunting memories of the Partition era.
The events at Thoa Khalsa during the March 1947 Rawalpindi massacres remain one of the most painful and haunting memories of the Partition era.

बलात्कारियों की पैरोकार जिहादन

नेहरू-गाँधी के दौर ऐसे अनगिनत जौहर हुए। लेकिन दिल्ली के हिन्दू कॉलेज का मैगज़ीन Hindu College Gazette इसको लेकर क्या लिखता है वो सुनिए। इसकी वेबसाइट पर एक लेख मौजूद है जिसका शीर्षक है Partition and Patriarchy: The Story of Thoha Khalsa. इस लेख में लिखा हुआ है कि तोहा खालसा की स्त्रियों के सामूहिक आत्महत्याओं के पीछे का कारण समाज की Patriarchal सोच है।

हिंदू कॉलेज गैजेट का मानना है कि हिंदू और सिख महिलाओं की सामूहिक आत्महत्या के पीछे की वजह जिहादी भेड़ियों से नोचे जाने का डर नहीं बल्कि हिंदू समाज की पितृसत्ता वाली मानसिकता थी। जिहादी नरसंहारों का सच कैसे दबाया जाता है ये आर्टिकल इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। जब हिंदू कॉलेज जैसे संस्थान का गैजेट भी जिहादी बलात्कारियों पर बात करने की जगह उनसे बचने के लिए जौहर करने वाली महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा कर देता है तो फिर स्वरा भास्कर से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

आज जौहर को कायरता और मुस्लिमों की बलात्कारी सोच का बेशर्मी से बचाव करने वाली स्वरा भास्कर और आरफा जैसी जिहादनों को ये वीडियो जरूर देखना चाहिए ताकि उन्हें पता चल सके कि लाखों हिंदू स्त्रियों को ऐसा ख़ौफ़नाक क़दम क्यों उठाना पड़ा था?

पर सिर्फ अरफ़ा और स्वरा ही क्यों, शायद हमारे देश की GEN-Z को भी ये एक Irrational या Act of cowardice लगे क्यूंकि वास्तव में आज जब सुसाइड इतने आम हो चुके हैं हम सुसाइड को लैक ऑफ टॉलरेंस, लैक ऑफ सोशल इंटरैक्शन या लैक ऑफ इम्पैथी मानते हैं। पर जौहर इन सब चीज़ों की वजह से उठाया हुआ कदम नहीं था।

बेशक रेप विक्टिम्स को डिग्निटी से जीने का हक है लेकिन जिहादियों ने जो किया था वो केवल रेप नहीं था। क्या आपको रोबोट फ़िल्म का वो सीन याद है जिसमे चिट्टी रोबोट एक नहाती हुई लड़की को बिना कपड़ों के ही आग से बचाकर बाहर लोगों की भीड़ के सामने ले आता है।

The III-Fated Well Thoha Khalsa (Pakistan)
The III-Fated Well Thoha Khalsa (Pakistan)

केवल इतने भर से ही उस लड़की को ऐसा मेंटल शॉक लगता है कि वो आग में कूदकर सुसाइड कर लेती है। ये तो केवल फ़िक्शन की बात है लेकिन अब आप जरा कल्पना कीजिए कि किसी स्त्री के पहले कपड़े फाड़े जाते हैं, फिर सरेआम उसकी नग्न परेड निकाली जाती है, फिर उसका गैंगरेप होता है और फिर उसे जानवरों की तरह बेच दिया जाता है और ये केवल इसलिए नहीं किया जाता कि वो एक महिला है, ये इसलिए किया जाता है क्योंकि वो काफ़िर है।

तब आप सोचिए कि उसकी मानसिक स्थिति क्या होगी? आत्मसम्मान जिन्हें प्यारा होगा वो ऐसा होने से पहले मरना ही पसंद करेंगे। खैर, अब आत्मसमान की उम्मीद उनसे क्या रखनी जिन्होंने तलवारों के डर से इस्लामी सलवारें पहन ली लेकिन जिहादियों के आगे ख़ुद को परोस देने वाले जब आज जौहर को कायरता बताते हैं, तब विडंबना वहीं पर सैकड़ों मौत मर जाती है।

जिनकी पूर्वज मुस्लिम आक्रांताओं के हरमों की शान बढ़ाया करती थीं वो भी आज जौहर को कायरता और पैट्रियार्की से जोड़ते हैं। तैमूर, ख़िलजी, औरंगज़ेब और जिन्ना को अब्बू मानने वाली जिहादी बलात्कारियों की पैरोकार इन जिहादनों को बताना जरूरी है कि जौहर कोई सामान्य आत्महत्या नहीं है।

ये स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियों द्वारा एक रेगिस्तानी और हैवानी विचारधारा के मुँह पर मारा गया जोरदार तमाचा है। स्वाभिमानी हिंदू स्त्रियाँ जिन्होंने आत्मसम्मान बचाने के लिए सैकड़ों जगह ऐसे जौहर किए और एक बार नहीं बल्कि बार-बार किए। उन्होंने अपने ही पिता, पति और भाइयों के हाथों अपनी गर्दनें कटवा दी, अग्निकुंडों में राख बन गई, पानी में डूब गई, लेकिन जिहादियों के क़ब्ज़े में जाना कभी स्वीकार नहीं किया।

पितृसत्ता नहीं, मातृसत्ता की जीत

और ये कोई अचानक आया हुआ विचार नहीं था। स्वरा भास्कर आज ये चाहती हैं कि जौहर करने वाली हिंदू स्त्रियों को मृत्यु को चुनने से अच्छा ख़ुद को जिहादियों को सौंप देना चाहिए था। उस दौर में भी समाज में कई ऐसी स्वरा भास्कर मौजूद थीं जिन्होंने ख़ुद को जिहादियों को सौंप दिया था। ऐसी हजारों महिलाओं के साथ जो हुआ वो बेहद डरावना था।

मशहूर चित्रकार KC आचार्य उस समय 28 साल के थे और उन्होंने ये सब अपनी आँखों से देखा था। रावलपिंडी की इस्लामी बर्बरता को उन्होंने अपनी एक पेंटिंग में दिखाया है। ये केवल चित्र नहीं है बल्कि इतिहास के उस काले अध्याय का जीवित और चीख-चीख कर गवाही देने वाला सबूत है क्योंकि इसे बनाने वाले चित्रकार ने हैवानियत के इस नंगे नाच को अपनी आँखों के सामने देखा था।

जिहादियों ने हिंदू स्त्रियों को नग्न करके सड़कों पर उनकी परेड निकलवाई। बारी-बारी उनका गैंगरेप किया गया, उन्हें जानवरों की तरह बेचा और लूटा गया। विरोध करने वाली स्त्रियों की छतियाँ, नाक और कान काट दिए गए। उनके जननांगों को तलवारों और भालों से छिन्न-भिन्न कर दिया गया। हैवानों की हवस ऐसी थी कि हिंदू और सिख स्त्रियों की लाशों तक से बलात्कार किए गए।

तोहा खालसा की महिलाओं ने हैवानियत की इन कहानियों को सुना और देखा हुआ था। उन्होंने अपनी आँखों के आगे गैंगरेप होते हुए देखे हुए थे। उन्होंने जिहादियों को बलात्कार के बाद गर्भवती महिलाओं के पेट चीरते हुए देखा था।

इस्लमिक दरिंदगी का शिकार बनाने वाली कुछ उनकी सहेलियाँ थी, तो कोई बगल के गाँव में ब्याही हुई उनकी बहन थी या उनके मायके में रहती, कुछ दिनों में माँ बनाने वाली उनकी भाभी थी। ये सब उनके अपने सगों के साथ हो चूका था। वो जानती थी कि अगर वो जीवित रहीं तो आगे उनके साथ यही होने वाला था।

और उससे बेहतर तो कुंए में कूद जाना है या फिर जलकर मार जाना। मौत दोनों तरफ़ थी लेकिन एक तरफ़ नरक जैसी यातना के बाद मरना था दूसरी तरफ़ सम्मान की मृत्यु थी। स्वरा भास्कर आज जो कह रही है उसके पीछे की सोच हिंदू कॉलेज जैसे संस्थानों के ऐसे ही गैजेट और लेखों से आती है।

एकेडमिक जिहाद यही तो है। धीरे-धीरे एक ऐसी चर्चा को जन्म दो कि विक्टिम ही शक के घेरे में खड़ा हो जाए। जिहादी हैवानों को एकदम क्लीन चिट दे दो। उनकी कोई गलती थोड़े ही है। उनका तो अधिकार है रेप करना क्योंकि मजहब इसकी इजाजत देता है।

लेकिन सवाल है कि ये हैवानी सोच क्या केवल ख़िलजी, मुग़ल या जिन्ना तक ही सीमित है? क्या आपको नोबेल ल्यूरेट्स नादिया मुराद याद है? नादिया मुराद एक यज़ीदी महिला है जो इराक़ और सीरिया में अल्पसंख्यक हैं। ISIS के जिहादियों ने हजारों यज़ीदी स्त्रियों को कई वर्षों तक सेक्स स्लेव बनाकर रखा।

नादिया बताती हैं कि जिहादियों ने हजारों यज़ीदी मर्दों और बच्चों को मार डाला। उसके बाद वे उनकी महिलाओं को अपने साथ ले गए। छोटी-छोटी बच्चियों तक को भी नहीं बख्शा गया। ये यज़ीदी स्त्रियाँ कई सालों तक ISIS के मुस्लिम आतंकियों के लिए बनाए गए सेक्स कैंप्स में रखी गई जहाँ उनका हजारों बार गैंगरेप किया गया।

सैकड़ों यज़ीदी महिलाओं ने इन सेक्स कैंप्स में आत्महत्याएँ की। बाद में जब इन्हें सेना ने रेस्क्यू किया तो हैवानियत की ऐसी कहानियाँ बाहर आई कि रोंगटे खड़े हो जाएँ। भारत हो या इराक़ या सीरिया, ख़िलजी हो, मुग़ल हों, जिन्ना हो या ISIS, बात चौदहवीं शताब्दी की हो चाहे आज की, काफ़िरों की स्त्रियाँ इस्लाम के लिए तब भी माल-ए-गनीमत थी, आज भी हैं और आगे भी रहेंगी। क्योंकि ऐसा ‘दीन का फ़रमान’ है।

जौहर तब भी हुए थे जौहर आगे भी होंगे क्योंकि हैवान तब भी थे आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। हैवानियत तब तक होती रहेगी जब तक समाज में स्वरा भास्कर जैसी जिहादन मंचों से बलात्कार का बचाव करने की हिम्मत करती रहेगी। हैवान तब तक सुरक्षित रहेंगे जब तक दिल्ली के हिंदू कॉलेज जैसी संस्थाओं के ऑफिशियल गैजेट्स बलात्कारियों की हिमायत करते रहेंगे।

जौहर को पैट्रियार्की से जोड़ने वालों को पता होना चाहिए कि ये असल में पैट्रियार्की नहीं थी। असल में जौहर जीत थी उस हिंदू मैट्रियार्की की जिसने जिहादी नस्लें पैदा करने से अच्छा मौत को चुना।

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