मुए मुकद्दस – पैगंबर साहब की दाढ़ी का बाल: On 27 December 1963, an act of serious sacrilege plunged Kashmir into grief and fury never witnessed before. As people in Srinagar woke up to an icy Friday morning on the 7th day of Chilai Kalan (the 40-day long harshest period of Kashmir winter), a shocking news spread like wildfire across the city. The Moi-e-Muqqadas (strand of holy hair of Prophet Muhammad, peace be upon him) was missing from the Hazratbal shrine, its abode for 300 years where it had arrived from Bijapur (Deccan) in south India during the reign of Aurangzeb Alamgir (1618–1707 AD). The outer doors of the hujra-e-khas (special chamber where the sacred relic was kept) “were hanging on hinges while the inner doors were found sawed through from the bottom”. The shocking news caused widespread bereavement and anguish among people who in no time poured on the streets in tens of thousands — barefooted, bareheaded, wailing and grieving, and shouting the slogan, Moi-e-Rasool-e-paak ko Wapas karo ae zalimo (O, Tormentors! Return the sacred hair of the Holy Messenger) and chanting ‘Allah-o-Akbar (Allah is Great) and Ya Rasool Allah (O, Messenger of Allah).
पैगंबर साहब की दाढ़ी के बाल की चोरी से हिल गया था भारत-पाक, पढ़ें पूरी रोचक कहानी
27 दिसंबर, 1963 – कश्मीर में इस दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने भारत और पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया। वह घटना थी ‘मुए मुकद्दस’ की चोरी। दरअसल ‘मुए मुकद्दस’ पैगंबर साहब की दाढ़ी या सिर के बाल को कहते हैं। मुस्लिमों के बीच ‘मुए-मुकद्दस’ के प्रति काफी श्रद्धा और सम्मान पाया जाता है। ‘मुए मुकद्दस’ की चोरी की खबर पूरे कश्मीर में जंगल की आग की तरह फैल गई। देखते ही देखते कश्मीर सुलगने लगा।

‘मुए मुकद्दस’
सैयद अब्दुल्ला 1635 में ‘मुए मुकद्दस’ को भारत लाए थे। माना जाता है कि सैयद अब्दुल्ला पैगंबर मोहम्मद के वंश से थे। उन्होंने बीजापुर शहर में इसे रखवा दिया। उनके बेटे सैयद हामिद से ‘मुए मुकद्दस’ कश्मीर के एक व्यापारी नुरुद्दीन के पास चला जाता है। यह उस दौर की बात है जब भारत पर औरंगजेब का शासन होता है। जब औरंगजेब को ‘मुए मुकद्दस’ के बारे में पता चलता है तो वह उसे कब्जे में लेने का आदेश देता है और अजमेर शरीफ की दरगाह में रखवा देता है। ‘मुए मुकद्दस’ को पास रखने के लिए औरंगजेब नुरुद्दीन को गिरफ्तार भी करवा देता है। 1700 में औरंगजेब ‘मुए मुकद्दस’ को लौटा देता है लेकिन तब तक नुरुद्दीन की मौत हो जाती है। नुरुद्दीन के उत्तराधिकारी ‘मुए मुकद्दस’ को सुरक्षित रखते हैं और बाद में हजरतबल दरगाह में रखवा देते हैं जहां से 27 दिसंबर, 1963 को इसकी चोरी हो जाती है।
विरोध
‘मुए मुकद्दस’ की चोरी की खबर सुनते हैं हजारों लोगों को हुजूम कश्मीर की गलियों में उमड़ पड़ता है। कई दिनों तक विरोध-प्रदर्शन जारी रहता है। कश्मीर के अलग-अलग भागों से बड़े-बड़े जुलूस का श्रीनगर की ओर मार्च जारी रहता है और तुरंत ‘मुए मुकद्दस’ को वापस लाने की मांग जोर पकड़ती जाती है। कश्मीर के शून्य से नीचे तापमान के माहौल में भी महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपने घरों को लौटने से मना कर देते हैं।

पाकिस्तान में भी विरोध
पाकिस्तान में भी विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया था। खासतौर पर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में स्थिति बदतर हो गई। वहां गैर मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं। हालांकि कश्मीर में ऐसा कुछ नहीं हुआ। कश्मीर में एक भी गैर मुस्लिम को नुकसान नहीं पहुंचाया गया बल्कि जम्मू-कश्मीर के हिंदुओं, सिखों और बौध धर्म के अनुयायियों ने मुस्लिमों के साथ एकजुटता का इजहार किया और विरोध मार्च में शामिल हुए।
विदेश में भी हलचल
‘मुए मुकद्दस’ की चोरी की खबर दुनिया भर में फैल गई। दुनिया भर की मीडिया का नई दिल्ली में जमावड़ा हो गया। यूरोप और अमेरिका के न्यूजपेपरों ने बड़ी-बड़ी रिपोर्टें प्रकाशित कीं। पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के आग्रह पर घाटी के हालात पर सुरक्षा परिषद में भी चर्चा हुई।

सरकार भी हिल गई
इस घटना से श्रीनगर और दिल्ली, दोनों जगह की सरकारें हिल गईं। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो से कश्मीरियों को संबोधित किया और आश्वासन दिया कि ‘मुए मुकद्दस’ की वापसी के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। अगले दिन फिर उन्होंने लोगों से रेडियो के माध्यम से शांति की अपील की। बार-बार रेडियो कश्मीर पर कश्मीर के मुख्यमंत्री शमशुद्दीन का संदेश भी प्रसारित किया गया। कश्मीर के मुख्यमंत्री ने ‘मुए मुकद्दस’ की वापसी में मदद करने वालों को 1,00,000 रुपये और जिंदगी भर 500 रुपये वार्षिक पेंशन देने का ऐलान भी किया। स्थिति सरकार के हाथ से बेकाबू होती दिख रही थी। देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रपति राधाकृष्णन और अपने मंत्रियों एवं सीबीआई निदेशक भोला नाथ मलिक के साथ बार-बार बैठकें कर रहे थे। एक बार हालत तो यह हो गई कि जम्मू-कश्मीर का स्थानीय प्रशासन केंद्र ने अपने हाथ में लेने का फैसला कर लिया। इसके लिए अधिकारियों के एक दल को तैयार रखा गया था। अधिकारियों के उस दल में भारत के गृह सचिव विश्वनाथन और एक पुलिस महानिरीक्षक शामिल थे। श्रीनगर के उपायुक्त नूर मोहम्मद तो हालत से घबराकर सेना की एक ब्रिगेड के कमांडर के पास पहुंच गए और राज्य का प्रशासन संभालने का आग्रह किया। लेकिन ब्रिगेड के कमांडर ने लिखित अनुमति मांगी जिसके लिए उपायुक्त तैयार नहीं हुए। फिर केंद्र सरकार ने एक जांच दल को कश्मीर भेजने का फैसला किया। जांच दल का नेतृत्व सीबीआई निदेशक भोला नाथ ने किया।

दुआओं का दौर जारी
राज्य में जगह-जगह दुआओं का सिलसिला भी जारी था। प्रशासन भी दुआ करवा रहा था ताकि किसी तरह ‘मुए मुकद्दस’ मिल जाए। उधर नेहरू ने अपने खास मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को स्थिति के जायजे के लिए वहां भेजा। उन्होंने भी दरगाह की जियारत की और ‘मुए मुकद्दस’ मिलने की दुआ मांगी।
रिकवरी
4 जनवरी, 1964 का दिन खुशी लेकर आया। सरकार ने अचानक ‘मुए मुकद्दस’ के मिलने की घोषणा की। इससे पूरे कश्मीर में खुशी की लहर दौड़ गई। हालांकि सरकार ने इस बात का खुलासा करने से इनकार कर दिया कि ‘मुए मुकद्दस’ आखिरकार कैसे मिला। सीबीआई निदेशक मलिक ने भी पूछने पर नहीं बताया। बाद में उन्होंने My Years with Nehru नाम की अपनी किताब में घटना के बारे में लिखा। उन्होंने कहा कि यह एक खुफिया ऑपरेशन था जिसका कभी खुलासा नहीं हुआ।

एक और टेंशन
‘मुए मुकद्दस’ के वापस मिलने से जो खुशी का माहौल था, वह तुरंत तनाव के माहौल में बदल गया। इसकी वजह एक अफवाह थी। अब यह अफवाह फैला दी गई कि जो अवशेष मिला है, वह असली नहीं बल्कि नकली है। फिर से हालात खराब होने लगे। सरकार के लिए एक बार फिर टेंशन की स्थिति पैदा हो गई। इस संकट को दूर करने के लिए कश्मीर के सूफी मीराक शाह को बुलाया गया। मीराक शाह ही वह इंसान थे जो ‘मुए मुकद्दस’ को पहचानते थे। मीराक शाह को लाल बहादुर शास्त्री की मौजूदगी में बुलाया गया। वह पल नेहरू और खुद शास्त्री के लिए एक इम्तिहान की घड़ी की तरह था। सूफी अगर उसे वाकई में नकली घोषित कर देता तो स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती थी। सबकी निगाहें मीराक शाह पर टिकी थीं और सांसें उनके फैसले पर। खैर उन्होंने पुष्टि की कि अवशेष असली है जिसके बाद पूरे कश्मीर में जश्न का माहौल बन गया।
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