चिड़ियों ने बाज़ार लगाया, एक कुंज को ख़ूब सजाया तितली लाई सुंदर पत्ते, मकड़ी लाई कपड़े-लत्ते बुलबुल लाई फूल रँगीले, रंग-बिरंगे पीले-नीले तोता तूत और झरबेरी, भर कर लाया कई चँगेरी पंख सजीले लाया मोर, अंडे लाया अंडे चोर गौरैया ले आई दाने, बत्तख सजाए ताल-मखाने कोयल और कबूतर कौआ, ले कर अपना झोला झउआ करने को निकले बाज़ार, ठेले …
Read More »चंपा और चमेली – प्रतिभा सक्सेना
चंपा ने कहा, ‘चमेली, क्यों बैठी आज अकेली क्यों सिसक-सिसक कर रोतीं, क्यों आँसू से मुँह धोतीं क्या अम्माँ ने फटकारा, कुछ होगा कसूर तुम्हारा या गुड़ियाँ हिरा गई हैं या सखियाँ बिरा गई हैं। भइया ने तुम्हें खिजाया, क्यों इतना रोना आया? अम्माँ को बतलाती हूँ, मैं अभी बुला लाती हूँ’ सिसकी भर कहे चमेली, ‘मैं तो रह गई …
Read More »आजा री निंदिया आजा – प्रतिभा सक्सेना
आजा री निंदिया आजा, मुनिया/मुन्ना को सुला जा मुन्ना है शैतान हमारा रूठ बितता है दिन सारा हाट-बाट औ’अली-गली में नींद करे चट फेरी शाम को आवे लाल सुलावे उड़ जा बड़ी सवेरी। आजा निंदिया आजा तेरी मुनिया जोहे बाट सोने के हैं पाए जिसके रूपे की है खाट मखमल का है लाल बिछौना तकिया झालरदार सवा लाख हैं मोती …
Read More »सद्य स्नाता – प्रतिभा सक्सेना
झकोर–झकोर धोती रही, संवराई संध्या, पश्चिमी घात के लहराते जल में, अपने गौरिक वसन, फैला दिये क्षितिज की अरगनी पर और उत्तर गई गहरे ताल के जल में डूब–डूब, मल–मल नहायेगी रात भर बड़े भोर निकलेगी जल से, उजले–निखरे सिन्ग्ध तन से झरते जल–सीकर घांसो पर बिखेरती, ताने लगती पंछियों की छेड़ से लजाती, दोनो बाहें तन पर लपेट सद्य – …
Read More »मास्टर की छोरी – प्रतिभा सक्सेना
विद्या का दान चले, जहाँ खुले हाथ कन्या तो और भी सरस्वती की जात और सिर पर पिता मास्टर का हाथ। कंठ में वाणी भर, पहचान लिये अक्षर शब्दों की रचना, अर्थ जानने का क्रम समझ गई शब्दों के रूप और भाव और फिर शब्दों से आगे पढ़े मन जाने कहाँ कहाँ के छोर, गहरी गहरी डूब तक बन गया व्यसन, मास्टर की छोरी। पराये …
Read More »पुत्र वधू से – प्रतिभा सक्सेना
द्वार खड़ा हरसिंगार फूल बरसाता है तुम्हारे स्वागत में, पधारो प्रिय पुत्र- वधू। ममता की भेंट लिए खड़ी हूँ कब से, सुनने को तुम्हारे मृदु पगों की रुनझुन! सुहाग रचे चरण तुम्हारे, ओ कुल-लक्ष्मी, आएँगे चह देहरी पार कर सदा निवास करने यहाँ, श्री-सुख-समृद्धि बिखेरते हुए। अब तक जो मैं थी, तुम हो, जो कुछ मेरा है तुम्हें अर्पित! ग्रहण …
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