झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की, उड़ने लगी बुझे खेतों से झुर झुर सरसों की रंगीनी, धूसर धूप हुई मन पर ज्यों – सुधियों की चादर अनबीनी, दिन के इस सुनसान पहर में रुकसी गई प्रगति जीवन की। सांस रोक कर खड़े हो गये लुटे–लुटे से शीशम उन्मन, चिलबिल की नंगी बाहों में भरने लगा एक …
Read More »दाने: केदार नाथ सिंह
नहीं हम मंडी नहीं जाएंगे खलिहान से उठते हुए कहते हैं दाने जाएँगे तो फिर लौट कर नहीं आएँगे जाते जाते कहते जाते हैं दाने अगर लौट कर आए भी तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे अपनी अंतिम चिट्ठी में लिख भेजते हैं दाने उसके बाद महीनों तक बस्ती में काई चिट्ठी नहीं आती ~ केदार नाथ सिंह
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