कल्पना और जिंदगी – वीरेंद्र मिश्र

दूर होती जा रही है कल्पना
पास आती जा रही है ज़िंदगी

चाँद तो आकाश में है तैरता
स्वप्न के मृगजाल में है घेरता
उठ रहा तूफान सागर में यहाँ
डगमगाती जा रही है ज़िंदगी

साथ में लेकर प्रलय की चाँदनी
चीखते हो तुम कला की रागिनी
दे रहा धरना यहाँ संघर्ष है
तिलमिलाती जा रही है ज़िंदगी

स्वप्न से मेरा कभी संबंध था
बात यह बीती कि जब मैं मंद था
आज तो गतिमय‚ मुझे कटुसत्य के
पास लाती जा रही है ज़िंदगी

तुम अँधेरे को उजाला मानते
होलिका को दीपमाला मानते
पर यहाँ नवयुग सवेरा हो रहा
जगमगाती जा रही है ज़िंदगी

आज आशा ही नहीं‚ विश्वास भी
आज धरती ही नहीं‚ आकाश भी
छेड़ते संगीत नव निर्माण का
गुनगुनाती जा रही है ज़िंदगी

भ्रम नहीं यह टूटती जंजीर है
और ही भूगोल की तस्वीर है
रेशमी अन्याय की अर्थी लिये
मुस्कुराती जा रही है ज़िंदगी

चक्रव्यूही पर्वतों के गाँव में
दूर काले बादलों की छाँव में
बीहड़ों में मौत को ललकारती
पथ बनाती जा रही है ज़िंदगी

दूर होती जा रही है कल्पना
पास आती जा रही है ज़िंदगी

∼ वीरेंद्र मिश्र

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