छोटी सी अपनी दुनिया हो,
दो उजले–उजले से कमरे
जगने को–सोने को,
मोती सी हों चुनी किताबें
शीतल जल से भरे सुनहले प्यालों जैसी
ठण्डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती हो
तितली–सी रंगीन बगीची
छोटा लॉन स्वीट–पी जैसा,
मौलसरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबा
हम हों, वे हों
काव्य और संगीत–सिंधु में डूबे–डूबे
प्यार भरे पंछी से बैठे
नयनों से रस–नयन मिलाए
हिल–मिलकर करते हों
मीठी–मीठी बातें
उनकी लटें हमारे कन्धें पर मुख पर
उड़–उड़ जाती हों,
सुशर्म बोझ से दबे हुए झोंकों से हिल कर
अब न बहुत हैं सपने मेरे
मैं इस मंजिल पर आ कर
सब कुछ जीवन में भर पाया।
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