हिमालय में गोद में बसा मोक्ष का पावन द्वार भगवान विष्णु को समर्पित नेपाल का मुक्तिनाथ मंदिर
नेपाल की हिमालयी गोद में, समुद्र तल से लगभग 3,710 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मुक्तिनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आत्मिक मुक्ति और शांति का प्रतीक है। यह मंदिर विश्व के दुर्लभतम तीर्थस्थलों में से एक है।
हिंदू धर्म के अनुसार यहीं भगवान विष्णु को वृंदा के श्राप से मुक्ति मिली थी इसलिए मुक्ति के देवता के रूप में मुक्तिनाथ की यहां पूजा की जाती है। मंदिर के चारों ओर 108 गाय के मुख हैं, जिनसे पवित्र जल निकलता है।
मुक्तिनाथ मंदिर, मुस्तांग जिला, नेपाल
| Name: | मुक्तिनाथ मंदिर (Muktinath Temple) |
| Location: | Muktinath (Dhawalagiri), Mustang District 33100 Nepal |
| Deity: | Lord Vishnu |
| Affiliation: | Hinduism / Buddhism |
| Creator: | The exact age of the Muktinath Temple is uncertain, but the present temple, built in the pagoda style, was constructed around 1815 AD by Queen Subarna Prabha Devi, the wife of King Rana Bahadur Shah and the daughter-in-law of King Prithvi Narayan Shah. |
| Completed In: | – |
| Altitude: | 3,710 meters (12,172 feet) above sea level |
मंदिर पैगोड़ा शैली में बना है और इसे हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के बीच धार्मिक समानता का प्रतीक माना जाता है। मुक्तिनाथ सबसे प्राचीन विष्णु मंदिरों में से एक है। मंदिर के सामने दो पवित्र जल कुंड हैं ‘लक्ष्मी कुंड और सरस्वती कुंड।’ ऐसा माना जाता है कि इन कुंडों में स्नान करने से ‘नकारात्मक कर्म‘ धुल जाते हैं।

मंदिर के संबंध में पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक के अनुसार जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्णु ने उनकी मदद की।
जब तक जालंधर की पत्नी वृंदा अपने सतीत्व को बचाए रखती तब तक उसे कोई पराजित नहीं कर सकता था। ऐसे में भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्व को नष्ट कर दिया।
वृंदा को इस बात का अहसास होता तब तक काफी देर हो चुकी थी। दुखी वृंदा ने भगवान विष्णु को शेष जीवन शिला (पत्थर) के रूप में व्यतीत करने का श्राप दे डाला।
फलस्वरूप कालांतर में शालिग्राम पत्थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्य है। भगवान विष्णु शालिग्राम पत्थर में निवास करते हैं। वृंदा श्राप देकर खुद को भी भस्म कर लेती है और उसकी राख से तुलसी का पौधा बनता है।
मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसी स्थान से होकर उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्बत गए थे। भगवान विष्णु को समर्पित मुक्तिनाथ नेपाल के चार धामों में से एक है और इसे मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है, जिसका अर्थ है मोक्ष।
मुक्तिनाथ मंदिर का इतिहास उन्नीसवीं सदी से जुड़ा हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि नेपाल की रानी ‘स्वर्णप्रभा’ ने इस मंदिर के निर्माण की पहल की थी।
दामोदर कुंड, शालिग्राम और गंडकी नदी का मुख्य स्रोत है, जो मुक्तिनाथ मंदिर के करीब स्थित है।
मुक्तिनाथ तक पहुंचने का मार्ग सहज नहीं है। कठिन चढ़ाइयां, कठोर मौसम और शारीरिक चुनौती- ये सब यात्रा को तपस्या में बदल देते हैं। शायद यही संदेश छिपा है कि मुक्ति सरल नहीं, साधना से प्राप्त होती है। आज जब हम त्वरित समाधान और मंदिर में भगवान की प्रतिमा तात्कालिक सुख की संस्कृति में जी रहे हैं, मुक्तिनाथ हमें धैर्य, संयम और आत्म अनुशासन का मूल्य सिखाता है।

काठमांडू और पोखरा से मुक्तिनाथ जाने के लिए अलग-अलग वैकल्पिक रास्ते हैं। मुक्तिनाथ मंदिर ट्रैकिंग और संरक्षण क्षेत्र में स्थित है इसलिए, इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए दो परमिट की आवश्यकता होती है।
मंदिर के दर्शन के लिए मार्च से जून और सितम्बर से नवंबर सर्वोत्तम महीने हैं।
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