कौन हैं पार्वती गिरी? जिन्हें मन की बात में PM मोदी ने किया याद: 16 साल की उम्र में स्वतंत्रता के लिए गईं जेल, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का हिस्सा बन अंग्रेजों को सिखाया सबक
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ में ओडिशा की वीरांगना पार्वती गिरी को याद किया। 11 वर्ष की उम्र से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहीं पार्वती गिरी ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, जेल गईं और आजादी के बाद समाजसेवा के लिए जीवन समर्पित किया।
Parvati Giri: Odisha Freedom Fighter
‘मन की बात’ के 129वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजादी के आंदोलन का हिस्सा बनने वाली ओडिशा की वीरांगना पार्वती गिरी को याद किया। पीएम ने कहा कि जनवरी 2026 में पार्वती गिरी की जन्म शताब्दी मनाई जाएगी। पार्वती गिरी के संघर्ष और समर्पण कार्यों का जिक्र करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने उड़िया भाषा में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
साल 2026 के आखिरी एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “आजादी के आंदोलन में देश के हर हिस्से के लोगों ने अपना योगदान दिया है। लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के अनेकों नायक-नायिकाओं को वो सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था। ऐसी ही एक स्वतंत्रता सेनानी हैं- ओडिशा की पार्वती गिरी जी। जनवरी 2026 में उनकी जन्म-शताब्दी मनाई जाएगी।”
Next month, we will mark the birth centenary of Parbati Giri Ji, who contributed to our freedom movement and also focussed on uplifting the poor as well as the marginalised. Paid homage to her during today’s #MannKiBaat. pic.twitter.com/VRp1gX5n3l
— Narendra Modi (@narendramodi) December 28, 2025
पार्वती गिरी के योगदान को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “उन्होंने 16 वर्ष की आयु में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था। आजादी के आंदोलन के बाद पार्वती गिरी जी ने अपना जीवन समाज सेवा और जनजातीय कल्याण को समर्पित कर दिया था। उन्होंने कई अनाथालयों की स्थापना की। उनका प्रेरक जीवन हर पीढ़ी का मार्गदर्शन करता रहेगा।”
अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता सेनानी पार्वती गिरी को श्रद्धांजलि देते हुए उड़िया भाषा में कहा, “मैं पार्वती गिरी जिंकु श्रद्धांजलि अर्पण करुछी।”

कौन हैं वीरांगना पार्वती गिरी?
भारत को आजादी दिलाने में कई स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान है। इनमें से ही एक हैं पार्वती गिरी। उनका नाम अक्सर किताबों या सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं लिया जाता है। लेकिन उनका समर्पण और संघर्ष आजादी के पन्नों में अहम है। बावजूद उनके बारे में आज देश इतना नहीं जानता है, जितना बाकी स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को जानता है।
पार्वती गिरी का जन्म 19 जनवरी 1926 को ओडिशा के संबलपुर जिले में हुआ। उनके पिता धनंजल गिरी गाँव के प्रमुख थे और चाचा रामचंद्र गिरी कॉन्ग्रेस नेता थे। इसीलिए वे आजादी के दौरान की राजनीति और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच पली-बढ़ी थी। घर में भारत की आजादी को लेकर बाते होतीं, तो उनके पार्वती गिरी को साहस मिलता।
यही वजह है कि उन्होंने 11 साल की छोटी उम्र से ही आजादी के आंदोलन का हिस्सा बनीं। शुरुआत में पार्वती गिरी कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार-प्रसार करती थीं। पार्टी की बैठकों में भी वे हिस्सा लेने लगीं।

महात्मा गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का बनी हिस्सा:
पार्वती गिरी ने 11 साल की उम्र में तीसरी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। तभी से वे महात्मा गाँधी के विचारों से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई के लिए आंदोलनों का हिस्सा बनने लगीं। महज 16 साल में उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया। पार्वती गिरी ने पश्चिमी ओडिशा के इलाकों में लोगों को एकत्रित किया और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज करने में अहम भूमिका निभाई।
वे गाँव-गाँव जाकर लोगों को अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के बारे में बताती थीं और उन्हें आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित करती थीं। उन्होंने खादी पहनने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और अंग्रेजी प्रशासन के आदेशों को न मानने का खुला आह्वान किया।
16 साल की उम्र में जेल जाना पड़ा
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पार्वती गिरी का जज्बा देख अंग्रेज प्रशासन बुरी तरह घबरा गया। आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों शुरू की। सिर्फ 16 साल की पार्वती गिरि को भी गिरफ्तार कर संबलपुर जेल भेज दिया गया, जहाँ उन्हें लगभग दो साल तक कैद में रखा गया।
जेल में रहते हुए भी उनका साहस नहीं टूटा। कम उम्र होने के बावजूद उन्होंने जेल प्रशासन के सामने झुकने से इनकार किया। बताया जाता है कि वे जेल में अन्य महिला बंदियों को भी आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करती थीं। हालाँकि, नाबालिग होने के चलते ब्रिटिश सरकार को घुटने टेकने पड़े और दो साल बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।
इस दौरान उन्होंने बरगढ़ की अदालत में सरकार विरोधी नारे लगाए, जिसके चलते उन्हें दो साल को जेल भी जाना पढ़ा था। लेकिन नाबालिग होने के चलते उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा, साल 1942 के बाद से देशभर में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन अभियान को तेजी से चलाया।
ब्रिटिश अदालतों के बहिष्कार का किया आह्वान:
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेज सरकार ने आंदोलनकारियों पर मुकदमे चलाने किए, तब ब्रिटिश अदालतें भी दमन का एक औजार बन गई थीं। इसी दौर में पार्वती गिरी ने एक बेहद साहसीय कदम उठाया और इन ब्रिटिश अदालतों का विरोध किया।
संबलपुर और बरगढ़ इलाके में जब स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजी अदालतों में पेश किया जाने लगा, तब पार्वती गिरी ने खुलकर कहा कि ये अदालतें न्याय के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकुमत को बचाने के लिए काम कर रही है। उन्होंने स्थानीय लोगों और खासकर वकीलों से अपील की कि वे इन अदालतों में पेश होना और काम करना बंद करें।
पार्वती गिरी खुद अदालत परिसर के आसपास जाकर लोगों को समझाती थीं कि अगर भारतीय ही अंग्रेजों की अदालतों को वैधता देते रहेंगे, तो आजादी की लड़ाई कमजोर पड़ जाएगी। कहा जाता है कि उनके आह्वान के बाद कई जगहों पर वकीलों ने मुकदमों से दूरी बनाई और आम लोग भी अदालतों में जाने से कतराने लगे थे।
इससे अंग्रेजी प्रशासन को काफी परेशानी हुई, क्योंकि बिना भारतीय सहयोग के अदालतें चलाना मुश्किल हो गया। एक कम उम्र की महिला द्वारा ब्रिटिश न्याय व्यवस्था को इस तरह खुली चुनौती देना उस समय असाधारण माना गया। यही वजह थी कि अंग्रेज अधिकारी पार्वती गिरी को खतरनाक मानने लगे और उनकी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी।
पार्वती गिरी का आजादी के बाद समाजसेवा को बनाया जीवन:
देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद पार्वती गिरी ने देखा कि देश तो आजाद हो गया, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी गरीबी, अशिक्षा और उपेक्षा में जी रहा है। उन्होंने तय किया कि उनकी लड़ाई अब सत्ता से नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय से होगी। वे खासतौर पर अनाथ बच्चों, बेसहारा महिलाओं, कैदियों और गरीब परिवारों के लिए काम करने लगीं।
पार्वती गिरी ने पश्चिमी ओडिशा में अनाथालय और आश्रम बनाए, जहाँ बेसहारा बच्चों को रहने, पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका मिला। वे खुद बच्चों की देखभाल करती थीं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर देती थीं। महिलाओं के लिए उन्होंने सुरक्षित आश्रय और रोजगार दिया।
इसके अलावा जेल की जिंदगी का अनुभव रखने के कारण पार्वती गिरी को कैदियों की पीड़ा का गहरा एहसास था। उन्होंने ‘जेल सुधार’ के लिए आवाज उठाई। वे जेलों में जाकर कैदियों से मिलती थीं, उनके परिवारों की मदद करती थीं और उनके पुनर्वास के लिए प्रयास करती थीं।
उन्होंने गरीब इलाकों में जाकर बीमार लोगों की मदद करती थीं। इलाज के लिए सहयोग जुटाती थीं और बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था भी करती थीं। उनका जीवन बेहद सादा था, लेकिन दूसरों की मदद के लिए वे कभी पीछे नहीं हटीं।
पार्वती गिरी के सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1984 में राष्ट्रीय सामाजिक सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके अलावा संबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी। वे आखिरी समय तक समाज के सबसे कमजोर लोगों के साथ खड़ी रहीं। 17 अगस्त 1995 को उन्होंने आखिरी सांस ली।
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