देव दीपावली: विश्व का अनोखा दीपोत्सव - काशी में स्वर्ग से उतरेंगे देवता, लाखों दीपों से जगमगाएँगे घाट

देव दीपावली: विश्व का अनोखा दीपोत्सव – काशी में स्वर्ग से उतरेंगे देवता, लाखों दीपों से जगमगाएँगे घाट

भोलेनाथ ने अपने प्रचंड पिनाक धनुष से केवल एक बाण चलाकर दैत्य त्रिपुरासुर के तीन अभेद्य नगरों (स्वर्ण, रजत, लौह) के त्रिपुरों का नाश कर दिया। इससे देवताओं का भय दूर हुआ और सभी ने मिलकर काशी में दीप जलाए और शिव की अराधना की।

कार्तिक पूर्णिमा की वह पावन तिथि आ चुकी है। भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) एक अलौकिक ऊर्जा और सौंदर्य से सराबोर होने को तैयार है। बुधवार (5 नवंबर 2025) की शाम, जैसे ही सूर्य देव अस्त होंगे, पतित पावनी माँ गंगा के ऐतिहासिक घाटों पर दीपों की अनगिनत कतारें जल उठेंगी और वह शुभ क्षण आ जाएगा जब धरती पर देवताओं की दीपावली- देव दीपावली मनाई जाती है। यह गहरा विश्वास है कि इस रात स्वयं देवता स्वर्ग से काशी में उतरकर दीप प्रज्ज्वलित करते हैं, और संपूर्ण वाराणसी क्षण भर के लिए देवलोक का रूप ले लेती है।

पौराणिक काल की विजयगाथा: त्रिपुरासुर का वध

देव दीपावली का इतिहास स्कंद पुराण और शिव पुराण के पन्नों में दर्ज है। यह कथा भगवान शिव की एक महान विजय से जुड़ी है। दैत्य त्रिपुरासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया था। वरदान के अनुसार, उसे केवल उसी समय मारा जा सकता था जब सूर्य, चंद्र और अग्नि का दुर्लभ संयोग (जिसे त्रिपुर संयोग कहा गया) बने। इस शक्ति के अहंकार में त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।

देव दीपावली मनाते हुए बनारस के घाट की तस्वीर
देव दीपावली मनाते हुए बनारस के घाट की तस्वीर

तब, स्वयं भोलेनाथ ने अपने प्रचंड पिनाक धनुष से केवल एक बाण चलाकर, उसके तीन अभेद्य नगरों- स्वर्ण, रजत और लौह के त्रिपुरों का नाश कर दिया। भगवान शिव की इस अजेय विजय से देवताओं का भय दूर हुआ। इस खुशी में, सभी देवताओं ने मिलकर काशी में दीप जलाए और शिव की आराधना की। तभी से यह दिन ‘देव दीपावली’ के रूप में मनाया जाने लगा।

दो कनस्तर तेल से निकले दीपोत्सव की आधुनिक शुरुआत

भले ही यह पर्व सदियों पुराना है, लेकिन इसे आज के भव्य रूप में लाने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। यह आधुनिक परंपरा वर्ष 1984 में शुरू हुई, जब पंडित विजय उपाध्याय ने अकेले सिंधिया घाट पर केवल दो कनस्तर तेल से दीप जलाकर इस भव्य दीपोत्सव की नींव रखी। अगले ही वर्ष, काशी के तत्कालीन नरेश डॉ विभूति नारायण सिंह भी इस अभियान से जुड़े, जिससे आयोजन को जन समर्थन मिला और सहयोग के लिए दुकानों पर दान-पात्र रखवाए गए।

साल 1986 में केंद्रीय देव दीपावली महासमिति का गठन हुआ और धीरे-धीरे यह आयोजन केवल घाटों तक सीमित नहीं रहा। 1990 के दशक तक, दीपों की यह श्रृंखला कुंडों, तालाबों और संपूर्ण नगर में फैल गई, जिससे आज यह काशी का सबसे बड़ा उत्सव बन गया है।

श्रद्धा और भव्यता का महासंगम

आज रात, वाराणसी के सभी प्रमुख घाटों- जिनमें अस्सी, दशाश्वमेध, पंचगंगा, नमो और चेतसिंह घाट शामिल है, पर लाखों दीप प्रज्वलित होंगे। सभी घाट समितियों ने दीपक और तेल का वितरण पहले ही पूरा कर लिया है।

वाराणसी के घाट पर पटाखों की बौछार
वाराणसी के घाट पर पटाखों की बौछार

इस बार चेतसिंह किला मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेगा, जहाँ 25 मिनट का भव्य लेजर शो दिखाया जाएगा। इस शो में शिव-पार्वती की कथाओं, गंगा अवतरण, लक्ष्मी-नारायण की कहानियों के साथ-साथ काशी के गौरवशाली इतिहास, संत कबीर, तुलसीदास और बीएचयू की झलकियाँ दिखाई जाएँगी। यह शो रात 8:15, 9:00 और 9:35 बजे प्रदर्शित किया जाएगा।

अस्सी स्थित पुष्कर तालाब पर एक विशेष दीपदान किया जाएगा, जहाँ महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, विदुषी गिरिजा देवी और प्रो वीरभद्र मिश्र जैसी काशी की महान विभूतियों की स्मृति में दीप जलाए जाएँगे।

गंगा का जलस्तर ऊँचा होने के बावजूद, कलाकार और छात्र मिलकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थीम पर विशेष दीप डिजाइन तैयार कर रहे हैं, जो काशी की कलात्मकता और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है। गंगा पार रेत पर ग्रीन क्रैकर्स की आतिशबाजी और संगीत की धुन पर नाचती रोशनी पूरे आकाश को रंगीन कर देगी।

जब गंगा के तट लाखों दीपों से आलोकित होते हैं, तो यह पर्व केवल दीयों की रोशनी का नहीं, बल्कि भक्ति, सौंदर्य और शिव की विजय का उत्सव बन जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन गंगा में दीपदान करने से सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

देव दीपावली काशी के हृदय में बसे उस शाश्वत और शाश्वत संदेश को दोहराती है: ‘जहाँ प्रकाश है, वहीं शिव हैं और जहाँ शिव हैं, वहाँ सृष्टि का उत्सव है।

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