किसी समय आज के नाइजीरिया की राजधानी कहलाने वाले नगर लागोस पर ओकापी नामक आदिवासी राजा का शासन था। ओकापी बहुत वीर और बलशाली था। उसने छोटे-छोटे कबीलों को मिला कर अपना राज्य स्थापित किया था।
लेकिन उसके राजा बनते ही उसके इर्द-गिर्द खुशामदी लोगों की भीड़ एकत्र होने लगी। वे बात-बात पर राजा की तारीफ करते थे। ओकापी वीर प्रवृत्ति का व्यक्ति था, उसे इस प्रकार की चाटुकारिता तथा खुशामद से सख्त नफरत थी लेकिन उसके मना करने के बावजूद वे लोग आदत से बाज नहीं आते थे।
बैंगन का भर्ता: नाइजीरिया की लोक कथा
राजा जब अधिक परेशान हो गया तो एक दिन उसने अपने गुरु के पास जा कर परामर्श करने का निश्चय किया। वह किसी तरह उन खुशामदी लोगों से छुटकारा पाना चाहता था पर छुटकारा पाने के लिए यह जानना बहुत जरूरी था कि कौन-कौन खुशामदी है? यही जानने के लिए उसने गुरु की शरण में जाने का निश्चय किया था।
उसका गुरु दूर एक जंगल में कुटिया बना कर रहता था। ओकापी ने उसके पास जा कर अपनी मनोव्यथा कह सुनाई। गुरु बोला, “सुनो, मैं तुम्हें खुशामदी लोगों से छुटकारा पाने का एक आसान-सा उपाय बताता हूं। मेरी बात ध्यान से सुनना।”
गुरु की बात सुन ओकापी की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने गुरु को प्रणाम किया और अपने किले में लौट आया। अगले दिन सवेरे उसने नाश्ते में बैंगन का भर्ता बनाने का आदेश दिया। रसोइए ने बड़ी लगन से बैंगन का भर्ता बनाया और नाश्ते के समय राजा के सम्मुख पेश कर दिया। भर्ता सचमुच स्वादिष्ट था। राजा चाव से खाने लगा और खाते वक्त बीच-बीच में तारीफ भी करता जाता।
नाश्ते के कक्ष में राजा के दरबार के कई खुशामदी लोग भी मौजूद थे। उन्होंने जब ओकापी को भर्ते को तारीफ करते देखा तो भला वे क्यों चुप रहते। वे सब भी हां-में-हां मिलाने लगे।
“हां, वीर सरदार। बैंगन का भर्ता बड़ा स्वादिष्ट होता है। इसके खाने से शरीर अधिक बलशाली होता है।” एक दरबारी बैंगन की प्रशंसा के पुल बांधता हुआ बोला।
ओकापी ने सुना तो उसके होंठों पर मुस्कान थिरक आई। वह जोर-जोर से खिलखिला कर हंसने लगा। अन्य खुशामदियों ने राजा को हंसते देखा तो उनसे भी न रहा गया। वे भी जोर-जोर से हंसने लगे। ओकापी ने नाश्ता खत्म कर लिया और आराम से बैठ गया।
अभी कुछ ही समय गुजरा था कि राजा पेट पर हाथ फेरते हुए दर्द से कराहने लगा। खुशामदियों ने अवसर अनुकूल पाया। वे जरा पास खिसक आए और सहानुभूतिपूर्वक पूछने लगे, “हे सरदार। आपको अचानक क्या हो गया है?”
ओकापी बोला, “लगता है, बैंगन का भर्ता खाने से पेट में दर्द हो गया है।”
एक खुशामदी तुरन्त बोला, “बैंगन का भर्ता कभी नहीं खाना चाहिए। यह वादी करता है।”
दूसरा बोला, “मैं तो सुझाव दूंगा कि बैंगन की खेती पर ही पाबंदी लगा दी जाए।”
तीसरा भला कहां चूकने वाला था। वह बोला “हां, बैंगन एक निकृष्ट सब्जी है।”
ओकापी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वह चीख कर बोला, “खामोश! अभी थोड़ी देर पहले तो तुम सब बैंगन की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। अब बुराई शुरू कर दी!”
खुशामदियों के चेहरे उत्तर गए। वे नजरें चुराने लगे। एक ने साहस करके कहा, “सरदार। हम तो आपके मन को देख कर बातें करते हैं।”
दूसरा बोला, “आपको खुश रखना तो हमारा परम कर्त्तव्य है।”
तीसरा बोला, “हम आपकी बात कैसे काट सकते हैं।”
राजा ओकापी क्रोध से बिफर उठे, “तुम लोग हमारे दरबारी हो। हमें सच्चाई से अवगत कराना तुम्हारा परम कर्त्तव्य है, परन्तु तुम स्वार्थ के लिए हमारी खुशामद में लगे रहते हो। तुम लोगों को हमारे दरबारी बने रहने का कोई हक नहीं है। तुम लोग न राज्य के हितैषी हो, न हमारे। गुणहीन लोग चापलूसी करके ही अपना काम चलाते हैं। कर्त्तव्यनिष्ठ और कर्मवीर प्राणी को भला ऐसी बातों के लिए समय ही कहां मिल पाता है।”
खुशामदी दरबारियों के चेहरे लटक गए। वे समझ चुके थे कि राजा पर उनका भेद खुल चुका है, अतः उन्होंने वहां से निकल चलने में ही भलाई समझी। इस घटना के पश्चात सभी चापलूस और खुशामदी लोगों से राजा को हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया।
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