Yearly Archives: 2017

चले नहीं जाना बालम – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

चले नहीं जाना बालम - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

यह डूबी डूबी सांझ उदासी का आलम‚ मैं बहुत अनमनी चले नहीं जाना बालम! ड्योढ़ी पर पहले दीप जलाने दो मुझ को‚ तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझ को‚ मंदिर में घण्टे‚ शंख और घड़ियाल बजे‚ पूजा की सांझ संझौती गाने दो मुझको‚ उगने तो दो उत्तर में पहले ध्रुव तारा‚ पथ के पीपल पर आने तो दो उजियारा‚ …

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अगर कहीं मैं घोड़ा होता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

अगर कहीं मैं घोड़ा होता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

अगर कहीं मैं घोड़ा होता वह भी लंबा चौड़ा होता तुम्हें पीठ पर बैठा कर के बहुत तेज मैं दौड़ा होता पलक झपकते ही ले जाता दूर पहाड़ी की वादी में बातें करता हुआ हवा से बियाबान में आबादी में किसी झोपड़े के आगे रुक तुम्हें छाछ और दूध पिलाता तरह तरह के भोले भोले इंसानों से तुम्हें मिलाता उनके …

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नए साल की शुभकामनाएं – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

नए साल की शुभकामनाएं - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को कुहरे में लिपटे उस छोटे से गांव को नए साल की शुभकामनाएं। जांते के गीतों को बैलों की चाल को करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को नए साल की शुभकामनाएं। इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को नए साल की शुभकामनाएं। …

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माँ की याद – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

माँ की याद - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

चींटियाँ अण्डे उठाकर जा रही हैं, और चिड़ियाँ नीड़ को चारा दबाए, धान पर बछड़ा रंभाने लग गया है, टकटकी सूने विजन पथ पर लगाए, थाम आँचल, थका बालक रो उठा है, है खड़ी माँ शीश का गट्ठर गिराए, बाँह दो चमकारती–सी बढ़ रही है, साँझ से कह दो बुझे दीपक जलाये। शोर डैनों में छिपाने के लिए अब, शोर …

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कितनी बड़ी विवशता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

Sarveshwer Dayal Saxena Hindi Love Poetry कितनी बड़ी विवशता

कितना चौड़ा पाट नदी का, कितनी भारी शाम, कितने खोए–खोए से हम, कितना तट निष्काम, कितनी बहकी–बहकी सी दूरागत–वंशी–टेर, कितनी टूटी–टूटी सी नभ पर विहगों की फेर, कितनी सहमी–सहमी–सी जल पर तट–तरु–अभिलाषा, कितनी चुप–चुप गयी रोशनी, छिप छिप आई रात, कितनी सिहर–सिहर कर अधरों से फूटी दो बात, चार नयन मुस्काए, खोए, भीगे, फिर पथराए, कितनी बड़ी विवशता, जीवन की, …

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कच्ची सड़क – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

कच्ची सड़क - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सुनो ! सुनो ! यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी जो मेरे गाँव को जाती थी। नीम की निबोलियाँ उछालती, आम के टिकोरे झोरती, महुआ, इमली और जामुन बीनती जो तेरी इस पक्की सड़क पर घरघराती मोटरों और ट्रकों को अँगूठा दिखाती थी, उलझे धूल भरे केश खोले तेज धार सरपत की कतारों के बीच घूमती थी, कतराती थी, खिलखिलाती …

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In Touch With Grandparents

In Touch With Grandparents

In the olden days it was common for children to grow up surrounded by grandparents, aunts, uncles, cousins and siblings. Today we see many nuclear families living far away from other members of the family, primarily due to career considerations. Of all such relationships the most significant is the one of grandparents and grandchildren. While physical distance becomes a big …

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