कोटेश्वर महादेव मंदिर, कच्छ, गुजरात: Koteshwar Mahadev Temple, Kutch, Gujarat

कोटेश्वर महादेव मंदिर, कच्छ जिला, गुजरात: Koteshwar Mahadev Temple, Kutch

रावण की एक गलती और भगवान विष्णु का बालक रूप… जानें कच्छ के कोटेश्वर मंदिर की क्यों है इतनी मान्यता, विराजमान हैं यहाँ स्वयं ‘संपत्ति के ईश्वर’

कोटेश्वर मंदिर का संबंध रावण से भी है। कहा जाता है कि रावण ने भगवान शिव से खुश होकर शिवलिंग माँगा था, जिसे वह लंका ले जाना चाहता था। शिव ने उसे एक शर्त के साथ शिवलिंग दिया कि रास्ते में उसे कहीं भी ज़मीन पर नहीं रखना है।

कोटेश्वर महादेव मंदिर, कच्छ, गुजरात: Koteshwar Mahadev Temple, Kutch, Gujarat

Name: कोटेश्वर महादेव मंदिर, कच्छ (Koteshwar Mahadev Temple, Kutch)
Location: MGQH+33M, Narayan Sarovar, Dhunay, Gujarat 370601 India
Dedicated to: Lord Shiva
Affiliation: Hinduism

गुजरात के कच्छ जिले में रेगिस्तान के रास्ते जब थकने लगते हैं तब समुद्र की गोद में बैठा एक प्राचीन शिव मंदिर दिखता है। जिसका नाम है कोटेश्वर महादेव मंदिर। यहाँ भगवान शिव स्वयं कोटेश्वर रूप में विराजमान हैं, जिन्हें ‘संपत्ति के ईश्वर‘ भी कहा जाता है। कोटेश्वर मंदिर भारत की आखिरी सीमा पर स्थित है। इसके आगे सिर्फ पानी है और पाकिस्तान की सरहद।

मान्यताओं के अनुसार, कोटेश्वर मंदिर का संबंध रावण से भी है। कहा जाता है कि रावण ने भगवान शिव से खुश होकर शिवलिंग माँगा था, जिसे वह लंका ले जाना चाहता था। शिव जी ने उसे एक शर्त के साथ शिवलिंग दिया कि रास्ते में उसे कहीं भी ज़मीन पर नहीं रखना है, लेकिन रावण रास्ते में थक गया और उसने एक चरवाहे बालक (जो स्वयं भगवान विष्णु थे) से मदद माँगी। उस बालक ने शिवलिंग को ज़मीन पर रख दिया। फिर वो बालक भी वहीं बैठ गया। आज उसी स्थान को कोटेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है।

यहाँ भगवान शिव स्वयं कोटेश्वर रूप में विराजमान हैं, जिन्हें 'संपत्ति के ईश्वर' भी कहा जाता है।
यहाँ भगवान शिव स्वयं कोटेश्वर रूप में विराजमान हैं, जिन्हें ‘संपत्ति के ईश्वर’ भी कहा जाता है।

नाम की व्युत्पत्ति:

कोटि शब्द का एक अर्थ सहस्त्र (१०००) होता है। यहाँ १००० शिवलिंग थे इसलिए इस स्थल का नाम कोटेश्वर पड़ा है। आज भी यहाँ अनेक शिवलिंग विद्यमान हैं और कालांतर के साथे कुछ नष्ट हो गये हैं। समुद्र में भी टूटे हुए शिवलिंग और मन्दिर के भग्नावशेष दिखाई देते हैं। रामायण और शिवपुराण में इस स्थल का उल्लेख मिलता है।

मंदिर का इतिहास:

कोटेश्वर मंदिर का जिक्र सबसे पहले ‘स्कंद पुराण‘ में मिलता है। मंदिर का विस्तार मौर्यकाल (लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, ये स्थान पहले बौद्ध धर्म का केंद्र भी रहा है, लेकिन धीरे-धीरे यह शिव उपासना का बड़ा स्थल बन गया। 10वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के शासकों ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और इसे गुजरात के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल किया। वहीं, 1819 में आए भूकंप से इस क्षेत्र को काफी नुकसान हुआ था लेकिन इसके बाद ब्रिटिश शासन में मंदिर का आंशिक पुनर्निर्माण किया गया।

10वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के शासकों ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और इसे गुजरात के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल किया
10वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के शासकों ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और इसे गुजरात के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल किया

मंदिर की संरचना:

मंदिर की संरचना बहुत ही साधारण लेकिन प्रभावशाली है। यह पूरी तरह से पत्थरों से बना हुआ है और इसकी बनावट पारंपरिक नागर शैली में है। जो गुजरात के मंदिरों की खास पहचान होती है। मंदिर का गर्भगृह छोटा है लेकिन बेहद पवित्र माना जाता है। इसके ऊपर ऊँचा शिखर है जो दूर से ही दिखाई देता है।

मंदिर की दीवारों पर नजर आने वाली सादगी ही इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबसूरती है। समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण यहाँ हमेशा ठंडी हवा बहती रहती है जो मंदिर के वातावरण को और भी पवित्र बना देती है।

मंदिर तक कैसे पहुँचे?

कोटेश्वर पहुंचने के लिए सबसे पहले भुज पहुंचें। दिल्ली, मुम्बई और अहमदाबाद से भुज तक रेल मार्ग से आ सकते हैं। रेलमार्ग से गांधीधाम आने के बाद वहाँ से भी भुज जा सकते है। मुम्बई और भुज के बीच दैनिक विमान सेवा भी है। अहमदाबाद से भुज की दूरी 350 कि॰मी॰ है। यहाँ से भुज पहुंचने के अनेक साधन हैं। भुज से कोटेश्वर जाते समय 36 किलोमीटर की दूरी पर 1100 वर्ष पुराना पुअरेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके बाद 95 किलोमीटर की दूरी पर कच्छ की कुल देवी माता आशापुरा की पीठ है। शारदीय नवरात्रों में यहां श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहता है। नारायण सरोवर-कोटेश्वर से 30 किलोमीटर आगे भारत-पाकिस्तान की सीमा है।

पहले नारायण सरोवर में ठहरने, भोजन आदि की व्यवस्था नहीं थी। इस कारण श्रद्धालुओं को बड़ी कठिनाई होती थी। पूरा इलाका वीरान होता था। किन्तु अब स्वयंसेवी संगठनों ने यहां ठहरने और खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था कर दी है। आवागमन भी अब सुगम हो गया है। कोटेश्वर जाने के लिए नारायण सरोवर पहुंचने के बाद वहाँ से चलके या वाहन में कोटेश्वर जा सकते है। अतिथिगृह और खाने की व्यवस्था नारायण सरोवर में हैं। कोटेश्वर में रात में नहीं रुक सकते और ये भारतीय सीमा को जोड़ने वाला विस्तार होने के कारण पर्यटन स्थलों के अलावा दूसरा विस्तार बाहर के लोगों के लिए प्रतिबन्धित है।

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