बाँध में पानी घटते ही बाहर आया सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर, रहस्यमई जलमग्न शिवलिंग है खास पहचान: जानें पुणे में क्यों उमड़े श्रद्धालु और क्या है इतिहास
इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर बेहद प्राचीन है। स्थानीय लोग इसे पांडव काल से जोड़ते हैं और मानते हैं कि इसका निर्माण महाभारत काल में हुआ था। हालाँकि कई इतिहास विशेषज्ञ इसे हेमाडपंती शैली का मंदिर मानते हैं।
महाराष्ट्र के पुणे जिले के भोर तालुका में इन दिनों एक ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है, जिसने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है। भाटघर बाँध का जलस्तर कम होते ही पानी के भीतर छिपा सदियों पुराना कांबरेश्वर मंदिर एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। साल के अधिकांश महीनों तक पानी में डूबा रहने वाला यह मंदिर हर वर्ष कुछ समय के लिए ही दिखाई देता है।
कांबरेश्वर मंदिर, भाटघर बांध, भोर तालुका, पुणे
| Name: | Kambareshwar Temple (पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर / कर्महरेश्वर / कामब्रेश्वर) |
| Location: | Velvandi River Basin, Kambare Bk, Karandi Khede Bare, Bhatghar Dam, Bhor Taluka, Haveli subdivision, Pune District, Maharashtra 412206 India |
| Deity: | Lord Shiva |
| Affiliation: | Hinduism |
| Accessible: | मई और जून के महीनों में इस मंदिर के दर्शन कर सकते हैं |
| Architecture Type: | Hemadpanti Architecture |
| Creator: | Mahabharat era |
| Completed In: | – |
यही वजह है कि इसे देखने के लिए श्रद्धालुओं, पर्यटकों, फोटोग्राफरों और इतिहास प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला, इंजीनियरिंग और इतिहास का जीवंत उदाहरण भी माना जाता है।
पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका मजबूत ढाँचा आज भी लोगों को हैरान कर देता है। मंदिर की रहस्यमयी बनावट, पानी में स्थित शिवलिंग और इससे जुड़ी मान्यताएँ इसे और भी खास बना देती हैं।

भाटघर बाँध का जलस्तर घटते ही सामने आया मंदिर
पुणे के भोर तालुका में स्थित ब्रिटिशकालीन भाटघर बाँध इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। बाँध में पानी का स्तर काफी नीचे पहुँच गया है, जिसके कारण इसके कैचमेंट एरिया में मौजूद कई हिस्से दिखाई देने लगे हैं। इन्हीं में सबसे प्रमुख है कांबरे गाँव का ऐतिहासिक कांबरेश्वर मंदिर।
वेलवंडी नदी पर बने इस मंदिर का अधिकांश हिस्सा हर साल मानसून के बाद पानी में डूब जाता है। जैसे-जैसे बारिश का पानी बढ़ता है, मंदिर पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और कई महीनों तक दिखाई नहीं देता। गर्मियों के मौसम में जब बाँध का जलस्तर घटता है, तब धीरे-धीरे मंदिर का शिखर नजर आने लगता है और फिर पूरा मंदिर सामने आ जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, मई के आखिर और जून की शुरुआत में यह मंदिर सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही समय होता है जब बड़ी संख्या में लोग यहाँ पहुँचते हैं। ग्रामीण हर साल मंदिर की सफाई करते हैं और वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर को खोला जाता है।

अंग्रेजों के बाँध निर्माण के बाद पानी में समा गया मंदिर
कांबरेश्वर मंदिर की कहानी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है। बताया जाता है कि वर्ष 1928 में अंग्रेजों ने लॉयड डैम यानी आज के भाटघर बाँध का निर्माण कराया था। बाँध बनने के बाद आसपास का बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो गया। कांबरे गाँव को दूसरी जगह बसाना पड़ा, लेकिन मंदिर को वहीं छोड़ दिया गया।
तब से हर वर्ष मानसून के दौरान यह मंदिर पानी में डूब जाता है और गर्मियों में फिर बाहर दिखाई देता है। दशकों से यही क्रम जारी है। समय के साथ यह मंदिर स्थानीय लोगों के लिए केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक बन गया है।
इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर बेहद प्राचीन है। स्थानीय लोग इसे पांडव काल से जोड़ते हैं और मानते हैं कि इसका निर्माण महाभारत काल में हुआ था। हालाँकि कई इतिहास विशेषज्ञ इसे हेमाडपंती शैली का मंदिर मानते हैं।
मंदिर की बनावट, पत्थरों की संरचना और निर्माण शैली इस बात की ओर इशारा करती है कि इसे मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य शैली में तैयार किया गया होगा।

मंदिर की बनावट आज भी इंजीनियरों को करती है हैरान
कांबरेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूती है। वर्षों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है। लगातार पानी की लहरों, गाद और मौसम के प्रभाव के बाद भी इसकी मुख्य संरचना सुरक्षित दिखाई देती है।
मंदिर की दीवारों को बड़े-बड़े तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया है। पत्थरों को बिना आधुनिक तकनीक के इतनी मजबूती से जोड़ा गया कि सदियों बाद भी उनका संतुलन बना हुआ है। मंदिर के शिखर और ऊपरी हिस्से में चूना पत्थर, रेत और पकी हुई ईंटों का उपयोग किया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय की निर्माण तकनीक बेहद उन्नत थी। यही कारण है कि लगातार पानी में रहने के बावजूद मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। हालाँकि समय के साथ कुछ हिस्सों में टूट-फूट जरूर हुई है, लेकिन इसकी नींव और मुख्य ढाँचा अब भी मजबूत दिखाई देता है।
मंदिर को देखने के लिए हर साल आर्किटेक्चर के छात्र, इंजीनियर, शोधकर्ता और इतिहासकार यहाँ पहुँचते हैं। उनके लिए यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का मास्टरपीस है।
पानी से भरा गर्भगृह और रहस्यमयी शिवलिंग
कांबरेश्वर मंदिर का गर्भगृह इसे और भी रहस्यमयी बना देता है। मंदिर पूरी तरह बाहर आने के बाद भी इसके भीतर घुटनों तक पानी भरा रहता है। इसी पानी के बीच भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है।
श्रद्धालु मंदिर के अंदर जाकर पानी में हाथ डालकर शिवलिंग को स्पर्श करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद लेते हैं। भक्तों के लिए यह अनुभव बेहद भावुक और आध्यात्मिक माना जाता है। मंदिर में माता पार्वती और नंदी महाराज की प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं।
पहले मंदिर तक पहुँचने के लिए पाँच सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती थीं, लेकिन हर साल जमा होने वाली मिट्टी और गाद के कारण अब वे सीढ़ियाँ दब चुकी हैं। गाँव वाले हर वर्ष मंदिर से गाद हटाने और सफाई करने का काम करते हैं ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन में परेशानी न हो।
मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा और एक खुला आँगन है। यहाँ वीरगळ यानी शहीद योद्धाओं की स्मृति में बनाई गई पत्थर की शिलाएँ भी मौजूद हैं, जो इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाती हैं।
पर्यटन, आस्था और इतिहास का अनोखा संगम बना मंदिर
कांबरेश्वर मंदिर अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है। हर साल जब यह पानी से बाहर आता है, तब दूर-दूर से लोग इसे देखने पहुँचते हैं। सुबह और शाम के समय मंदिर और वेलवंडी नदी का दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान यहाँ का नजारा पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए खास आकर्षण बन जाता है।
स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत लोगों से मंदिर की पवित्रता बनाए रखने की अपील भी करते हैं। गाँव वालों का कहना है कि यह केवल घूमने की जगह नहीं, बल्कि उनकी आस्था और परंपरा का केंद्र है। इसलिए यहाँ आने वाले लोगों को धार्मिक मर्यादा और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए।
ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर तक पहुँचने वाले रास्ते को भी सुरक्षित बनाया है। हर साल मंदिर खुलने के बाद यहाँ पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हजारों श्रद्धालु पानी में मौजूद शिवलिंग के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं।
सदियों पुरानी विरासत की जीवित मिसाल है कांबरेश्वर मंदिर
कांबरेश्वर मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला कितनी उन्नत और टिकाऊ थी। पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका अस्तित्व बना रहना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। हर साल कुछ दिनों के लिए पानी से बाहर आने वाला यह मंदिर मानो समय के भीतर छिपी एक कहानी को फिर से जीवित कर देता है।
भोर तालुका का यह प्राचीन शिव मंदिर आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है और यह साबित करता है कि भारत की ऐतिहासिक धरोहरें केवल पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति की जीवित पहचान हैं।
उपयोगी जानकारी:
- भोर से 32 किमी दूर
- आप भोर से एसटी और रिक्शा द्वारा इस गांव तक पहुंच सकते हैं।
- यदि जून में भारी बारिश होती है, तो दर्शन नहीं होंगे।
- निजी वाहन कंब्रे गांव तक पहुंच सकते हैं।
- यहां बेड एंड ब्रेकफास्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
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