एड्स रोगी की प्रेरणादायक सच्ची कहानी: हर साल 1 दिसम्बर को दुनिया भर में विश्व एड्स दिवस के रूप में मनाया जाता है।
आप तो जानते ही हैं, एड्स एक लाइलाज बीमारी है। ऐसे में जिन लोगों को एड्स हो जाये उनका निराश होना स्वाभाविक ही है। मेरे विचार से एड्स दिवस मानाने की सार्थकता तभी है जब हम एड्स से ग्रसित लोगों के जीवन में उम्मीद की एक नयी किरण ला पायें और इस बीमारी के बारे में अधिक से अधिक जागरूकता ला सकें, ताकि ये और न फैले।
विजयरानी: एक एड्स रोगी की कहानी
हम हमेशा ऐसे शूरवीरों की तलाश में रहता है जो समाज के लिए एक अच्छा उदहारण रख सकें। और इसी क्रम में हम आपको आज मिलवा रहें हैं Usilampatti, Madurai, Tamil Nadu की विजयरानी जी से।
विजयरानी का एक हँसता–खेलता परिवार था, लेकिन करीब तीन साल पहले जब ये पता चला कि वो और उनका छ: वर्षीय बेटा HIV Positive (+) है तो उनकी दुनिया ही बदल गयी। दरअसल उन्हें तो ये बीमारी थी पर उनके पति को ये बीमारी नहीं थी, फिर क्या था पति ने विजयरानी और उनके बेटे को छोड़ दिया।
अगर आप सोच रहें हैं की आखिर इन्हें AIDS हुआ कैसे तो बता दें की विजयरानी को ये बीमारी उनके पहले पति से हुई थी जो कुछ साल पहले ही गुजर चुका था।
इन विषम परिस्थितियों में भी विजयरानी ने हिम्मत नहीं हारी और एक अन्य HIV+ lady, Sumathi के साथ मिल कर एक इडली-डोसा की दुकान खोली। अच्छी बात तो ये है कि इन दोनों ने कभी किसी से छुपाया नहीं की उन्हें AIDS है। लोग भी धीरे-धीरे जागरूक हो चुके थे कि सिर्फ छूने-छाने से AIDS नहीं फैलता है। ऊपर से उनके खाने में स्वाद तो था ही, बस उनकी दुकान चल पड़ी।
आज इस छोटी से जगह में रह कर भी विजयरानी हर महीने 15000 रूपये कमा लेती हैं, उनका बेटा भी एक होनहार विद्यार्थी है, जो class में हमेशा Top 10 में रहता है।
इस लेख में कुछ ध्यान देने योग्य अच्छी बाते हैं:
- एक विधवा की दुबारा शादी होना, समाज में हो रहे positive बदलाव का एक अच्छा सूचक है।
- पत्नी को AIDS होने के बाद भी पति को एड्स ना होना दर्शाता है कि यदि सही contraceptives का उपयोग किया जाए तो एड्स आपको नहीं छू सकता।
- AIDS ग्रसित रोगियों द्वारा चलायी जा रही दुकान का successful हो जाना ऐसे लोगों के प्रति society की नयी सुधरी हुई सोच का indicator है।
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