सदियों पुराना रहस्यमयी शिवलिंग… नासिक के त्र्यंबकेश्वर मंदिर में ‘अमृत कुंड’ की सफाई के दौरान ASI को मिली धरोहर, जानिए – इस ऐतिहासिक ज्योतिर्लिंग की कहानी
इतिहास बताता है कि साल 1690 में क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने यहाँ के प्राचीन मंदिर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था। मुगलों के उस भीषण हमले के दौरान पवित्र मूर्तियों और शिवलिंग को खंडित होने से बचाने के लिए पुजारियों ने उन्हें चुपके से पानी के भीतर छिपा दिया था।
महाराष्ट्र के नासिक में स्थित देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर से एक बेहद चमत्कारी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की टीम जब मंदिर के भीतर मौजूद प्राचीन और ऐतिहासिक जल निकाय ‘अमृत कुंड’ की सफाई कर रही थी, तब उसके तलवे से एक प्राचीन पत्थर का नक्काशीदार शिवलिंग मिला।
त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंग मन्दिर, नासिक
| Name: | Trimbakeshwar Shiva Temple (श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर) |
| Location: | Trimbak Village, Nashik District, Maharashtra 422212 India |
| Deity: | Lord Shiva |
| Affiliation: | Hinduism |
| Festival: | Maha Shivratri |
| Architecture Type: | Hemadpanthi |
| Creator: | Balaji Baji Rao |
| Completed In: | Ancient (date uncertain) |
यह अद्भुत शिवलिंग अमृत कुंड की तलहटी में दशकों से जमा कीचड़ और मलबे के नीचे पूरी तरह से दबा हुआ था। पुरातत्व विशेषज्ञों के शुरुआती अनुमान के मुताबिक यह शिवलिंग कम से कम 240 साल पुराना है, लेकिन इसके इससे भी कहीं ज्यादा प्राचीन यानी लगभग 335 साल से भी पुराना होने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
During the ongoing conservation works by ASI at the Trimbakeshwar Temple, Nashik, a stone Shivalinga was discovered during the desilting of the temple’s historic water tank, locally known as Amrit Kund.
The Shivalinga was found at the bottom of the tank while removing… pic.twitter.com/34KcEk3AUb
— Archaeological Survey of India (@ASIGoI) July 1, 2026
जब सूख गया कुंड और सामने आया इतिहास
रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरी घटना किसी कहानी जैसी लगती है, जहाँ एक ऐतिहासिक कुंड को सुखाया जाता है और उसके नीचे से कुछ ऐसा निकलता है जिसे आज की पीढ़ी के किसी भी जीवित भक्त ने अपनी आँखों से कभी नहीं देखा था। ASI की टीम पिछले कुछ समय से त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर के भीतर बने लगभग 65 फीट गहरे पत्थर के इस ऐतिहासिक कुंड को खाली करके उसकी गाद निकालने के काम में जुटी हुई थी।

इस प्राचीन कुंड को स्थानीय लोग ‘अमृत कुंड’ या ‘अमृतवर्षिणी कुंड’ के नाम से भी जानते हैं। जैसे-जैसे कर्मचारियों ने आधुनिक पंपों की मदद से पानी को निकाला और सदियों से जमा कीचड़ को हटाना शुरू किया, वैसे-वैसे कुंड की तलहटी से काले पत्थर का एक सुडौल शिवलिंग आकार लेने लगा। इस शिवलिंग की मौजूदगी अब तक केवल स्थानीय बुजुर्गों की मौखिक कहानियों और यादों में ही जिंदा थी, लेकिन अब यह हकीकत बनकर सबके सामने आ चुका है।
क्या है इस अद्भुत शिवलिंग की उम्र का असली गणित
पुरातत्व विभाग ने अभी तक इस नए मिले शिवलिंग की कोई वैज्ञानिक जाँच जैसे पेट्रोग्राफिक स्टडी, लिथोलॉजी या तलछट विश्लेषण नहीं किया है। इसलिए अभी तक इसकी बिल्कुल सटीक और प्रमाणित उम्र की घोषणा किसी आधिकारिक रिसर्च पेपर में नहीं की गई है।

लेकिन इतिहास और वास्तुकला के जानकार इसके समय का एक पक्का दायरा जरूर तय कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक अमृत कुंड जिस मुख्य मंदिर परिसर के भीतर स्थित है, उसका पुनर्निर्माण साल 1755 से 1786 के बीच मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव ने करवाया था। इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यह पत्थर और इस पर की गई नक्काशी कम से कम 240 साल पुरानी तो है ही।
औरंगजेब के हमले और शिवलिंग को छिपाने का रहस्य
इस खोज को लेकर इतिहासकार और स्थानीय लोग एक और बेहद दिलचस्प थ्योरी पर विचार कर रहे हैं। इतिहास बताता है कि साल 1690 में क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने यहाँ के प्राचीन मंदिर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था। स्थानीय मौखिक इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों में यह दावा किया जाता है कि मुगलों के उस भीषण हमले के दौरान पवित्र मूर्तियों और शिवलिंग को खंडित होने से बचाने के लिए पुजारियों ने उन्हें चुपके से पानी के भीतर छिपा दिया था।
अगर यह शिवलिंग उसी काल का है, तो इसकी उम्र आसानी से 335 साल या उससे भी ज्यादा हो सकती है। हालाँकि त्र्यंबकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अपने लिखित दस्तावेजों में केवल मंदिर के पुनर्निर्माण की तारीखों का जिक्र मिलता है, पानी में किसी पत्थर को छिपाने का कोई पुख्ता लिखित प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। अब केवल प्रयोगशाला की जांच ही इस रहस्य पर से अंतिम पर्दा उठा पाएगी।
प्रकृति की मार से कैसे बचा रहा यह बेसाल्ट पत्थर
इस खोज का एक सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि सदियों तक पानी और कीचड़ के नीचे दबे रहने के बावजूद यह शिवलिंग बिल्कुल सही सलामत और अपने मूल आकार में है। इसके पीछे एक गहरा भूवैज्ञानिक कारण काम कर रहा है। दरअसल पूरा नासिक और त्र्यंबकेश्वर का यह इलाका ‘दक्कन ट्रैप’ क्षेत्र में आता है, जहाँ करोड़ों साल पहले हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण मजबूत काले बेसाल्ट पत्थरों की मोटी परतें बन गई थीं।
यहाँ के स्थानीय कारीगरों ने पिछले 2,000 से अधिक वर्षों से इसी काले बेसाल्ट पत्थर को तराश कर कई भव्य मंदिरों, मजबूत किलों और गुफाओं का निर्माण किया है क्योंकि इस पत्थर पर पानी और मौसम की मार का असर बहुत कम होता है। पानी के अंदर डूबे होने के कारण यह पत्थर सीधे सूरज की रोशनी और तापमान के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह बचा रहा, जिससे इसकी नक्काशी आज भी वैसी की वैसी ही चमक रही है।
गाद निकालना कैसे बन गया एक ऐतिहासिक उत्खनन
पुरातत्व विभाग के लिए यह काम केवल एक साधारण सफाई अभियान नहीं था, बल्कि यह एक बेहद नियंत्रित और वैज्ञानिक उत्खनन की तरह था। बारिश के हर मौसम में इस तरह के प्राचीन जल निकायों में मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों की एक नई परत जमा होती जाती है, जो समय के साथ ठोस गाद बन जाती है।
ASI के विशेषज्ञों ने बहुत ही धैर्य के साथ कीचड़ की एक-एक परत को हटाया ताकि नीचे छिपी किसी भी प्राचीन कलाकृति को नुकसान न पहुँचे। यह खोज दिखाती है कि बिना किसी बड़ी खुदाई के भी, केवल सही संरक्षण और देखरेख के जरिए हम भारत की समृद्ध और पवित्र सांस्कृतिक विरासत के खोए हुए हिस्सों को कैसे वापस पा सकते हैं।
श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का गौरवशाली इतिहास
श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक शहर से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर बेहद खूबसूरत ब्रह्मगिरि पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। समुद्र तल से लगभग 3,000 फीट की ऊंचाई पर बसी यह जगह बेहद पवित्र मानी जाती है क्योंकि इसी ब्रह्मगिरि पर्वत से दक्षिण की गंगा कही जाने वाली पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम होता है।
इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है, लेकिन वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव (जिन्हें नानासाहेब पेशवा भी कहा जाता है) ने साल 1740 से 1760 के बीच एक पुराने मंदिर के स्थान पर ही शुरू करवाया था। इस मंदिर का भव्य उद्घाटन 16 फरवरी 1756 को महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर बकायदा पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे शहनाई, चौघड़ा, तुतारी और रणसींग के मधुर और ओजस्वी स्वरों के साथ किया गया था।
इतिहास के झरोखों से देखें तो साल 1742 में मराठों ने इस पूरे क्षेत्र को निजाम के नियंत्रण से जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। बाद में साल 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन के बाद यह ऐतिहासिक मंदिर ब्रिटिश शासन के अधीन चला गया और आजादी के बाद अब यह भारत सरकार के संरक्षण में है। इस मंदिर का धार्मिक महत्व संत परंपरा से भी बहुत गहरा जुड़ा हुआ है।
महान संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज के बड़े भाई और वारकरी संप्रदाय के प्रणेता संत निवृत्तिनाथ ने इसी पावन भूमि त्र्यंबकेश्वर में महज 24 वर्ष की आयु में संजीवन समाधि ली थी। संत निवृत्तिनाथ के कहने पर ही संत ज्ञानेश्वर ने आम जनमानस के कल्याण के लिए प्राकृत भाषा में भगवद्गीता पर अपनी प्रसिद्ध टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखी थी। आज भी हर साल संत निवृत्तिनाथ की पुण्यतिथि पर लाखों की संख्या में वारकरी श्रद्धालु इस पावन नगरी में जुटते हैं।
प्रशासनिक इतिहास की बात करें तो साल 1954 में इस पूरे संस्थान को पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत किया गया था। इसके बाद साल 1995 से इस मंदिर के संचालन के लिए एक सुव्यवस्थित ‘बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज’ का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष जिला जज द्वारा नियुक्त माननीय न्यायाधीश होते हैं और त्र्यंबक नगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इसके सचिव के रूप में काम करते हैं।
वर्तमान में मंदिर ट्रस्ट द्वारा श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस भक्त निवास और अन्य बेहतर व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। अमृत कुंड से मिले इस नए शिवलिंग ने इस पावन मंदिर के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गौरव को पूरी दुनिया में एक बार फिर से बढ़ा दिया है।
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