The Conversion: 2022 Film on Love Jihad & Conversion

The Conversion: 2022 Film on Love Jihad & Conversion

Movie Name: The Conversion
Directed by: Vinod Tiwari
Starring: Vindhya Tiwari, Prateek Shukla, Ravi Bhatia, Vibha Chhibber, Sunita Rajwar, Amit Behl, Sandeep Yadav, Sushil Singh, Manoj Joshi
Genre: Drama, Family, Romance
Release Date: 06 May, 2022
Running Time:
134 Minutes
Rating:   

A Movie that explores the sensitive topic of religious conversion, this movie is a captivating drama depicting girl’s dilemma of what happens in an inter-faith marriage that results in religious conversion.

द कन्वर्जन: छल, निकाह, हलाला… पर्दे पर लव जिहाद की घृणित क्रूरता जो डराती भी है, बाँधती भी है

कुल मिलाकर एक नाज़ुक विषय पर बनी एक सशक्त फिल्म है – द कन्वर्जन। मुद्दा विवादास्पद होने के साथ-साथ समीचीन भी है। फिल्म पर राजनीति होना भी अवश्यम्भावी है।

सीमा की नजर बार-बार अपने मोबाइल की डिजिटल घड़ी पर जा रही थी। नौ बजने को आए थे पर फिल्म अभी तक शुरू नहीं हुई थी। उसे चिंता थी कि फिल्म लम्बी चली तो खाना मिल पाएगा कि नहीं। पिछली बार हम जब द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) का पहले दिन का शो देखने गए थे, तब भी देर रात होने से सारे रेस्टोरेंट बंद हो चुके थे। खाना उस दिन भी नहीं मिला था। कल यानी गुरुवार (5 मई 2022) की रात तो हम दिल्ली के चाणक्य सिनेमा में द कन्वर्जन (The Conversion) का ग्रेंड प्रीमियर देखने के लिए आए थे।

प्रीमियर का घोषित समय था शाम सात बजे का। मैंने मुझे बड़े आदर भाव से निमंत्रित करने वाले मित्र कपिल मिश्रा से पूछा भी था तो उन्होंने कहा था कि आप 7.25 तक आएँगे तो चलेगा। इसलिए मेरा अनुमान था कि कुल मिलाकर 7.45 तक तो पिक्चर शुरू हो ही जाएगी। ढाई घंटे की लम्बी फिल्म हुई तो भी साढ़े दस तक तो हम फारिग हो जाएँगे। लेकिन यहाँ तो नौ बज चुके थे और फिल्म शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक-दो बार बीच में कभी वीडियो तो कभी आवाज आती थी पर फिर गायब हो जाती थी।

Love Jihad: Wikipedia

Love jihad (also known as Romeo Jihad) is an Islamophobic conspiracy theory developed by proponents of Hindutva. The conspiracy theory purports that Muslim men target Hindu women for conversion to Islam by means such as seduction, feigning love, deception, kidnapping, and marriage, as part of a broader demographic “war” by Muslims against India, and an organised international conspiracy, for domination through demographic growth and replacement.

बार-बार कुछ तकनीकी गड़बड़ी की घोषणओं के बीच खचाखच भरे ऑडी 3 में दर्शक धैर्य और उत्कंठा से फिल्म शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे। मेरा पत्रकारीय मन किसी गड़बड़ी या अनिष्ट की आशंका भी कर रहा था। मुझे ध्यान आ रहा था कि अभूतपूर्व सफलता पाने वाली कश्मीर फाइल्स को भी शुरू के दिनों में कुछ थियेटरों में दिक्क्तों का सामना करना पड़ा था। दूर क्यों जाया जाए, पिछले हफ्ते ही राजधानी के फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट क्लब और फिर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कश्मीर फाइल्स के सफल निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को प्रेस वार्ता करने की इजाजत नहीं दी थी। द कन्वर्जन (The Conversion) तो सीधे-सीधे एक बेहद विवादित मगर ज्वलंत मुद्दे पर बनी फिल्म है। न जाने दिन-रात ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की वकालत करने वालों में से किसी को ‘सलेक्टिव सेकुलरवाद’ का कौन सा कीड़ा काट जाए और फिल्म का प्रदर्शन ही रोक दिया जाए।

ऐसे कई सवाल मन में उस भूख की तरह बिलबिला रहे थे जो हमारे पेट में भी हलचल मचा रही थी। इतनी भीड़ में उठकर कुछ खाने के लिए जाना भी अटपटा लग रहा था। मगर तकनीकी गड़बड़ से भूख थोड़े ही रुकती है सो कई लोग बड़े साइज की बाल्टी के आकार के कागज के डिब्बों में पॉपकॉर्न लेकर आना शुरू कर चुके थे। इससे उठती महक ने हमारी भूख की भड़कती अग्नि में मानो घी डाल दिया। वो तो भला हो साथ की सीट पर बैठे श्रीमान विनोद बंसल की बिटिया विदुषी का जो उठकर गई और तीन लार्ज पॉपकॉर्न के डिब्बे ले आई। एक सादा नमकीन, एक चीज वाले और एक कैरामल के स्वाद वाले। मालूम नहीं कि ये विदुषी के उठ के जाकर पॉपकॉर्न लाने का कमाल था या देरी के लिए किए जाने वाली बंसल साहब की ट्वीट का कि ऐसा होने के कुछ समय बाद फिल्म चालू हो गई।

यकीन मानिए, फिल्म देखने के बाद न मुझे और न ही सीमा को उस देरी पर कोई गिला-शिकवा रहा जो अबतक हुई थी। सबसे पहली बात तो ये कि ये एक बेहद साहसपूर्ण विषय पर बनाई फिल्म है। फिल्म देखने जाते हुए मन में था कि कहीं ये महज एक नजरियाती प्रोपेगेंडा फिल्म ही न हो। सोचा था कि यदि ऐसा हुआ तो हम बीच में उठकर चले आएँगे। इससे हमें बुलाने वाले कपिल मिश्रा के आग्रह की इज्जत भी रह जाएगी और हमारा समय भी जाया नहीं होगा। पर ऐसी नौबत नहीं आई और अगर एक-दो दृश्यों को छोड़ दिया जाए तो फिल्म ने हमें लगातार बाँधे रखा। सीमा को अगली सुबह जल्दी ऑफिस जाना था तो भी उन्होने कहा कि अब तो पूरी फिल्म देखनी ही है।

फिल्म की कहानी को देखा जाए तो मध्यांतर तक फिल्म थोड़ी हलकी-फुल्की रहती है। अच्छा संगीत, दृश्यानुसार गीत और सुरुचिपूर्ण लोकेशन फिल्म को गति देते हैं। गीत कर्णप्रिय हैं। वाराणसी के घाट, कैम्पस की बिंदास ज़िन्दगी और एक संस्कारवादी हिन्दू माता-पिता तथा उनकी ‘मॉर्डन’ बेटी के बीच के टकराव का अच्छा चित्रण निर्देशक विनोद तिवारी ने किया है। कहानी लिखी है वंदना तिवारी ने। फिल्म ये बताने में सफल है कि ‘लव जिहाद’ अब हिंदूवादियों की एक राजनीतिक फेंटेसी मात्र नहीं, बल्कि ऐसी सच्चाई है जिससे समाज को लगातार दो-चार होना पड़ रहा है। यों तो प्यार और जिहाद दो कभी न मिलने वाले अलग-अलग किनारे जैसे लगते हैं, मगर मजहबी कट्टरता कई बार आदमी को इंसान बने नहीं रहने देती। धर्मान्धता में अपने मजहब के विस्तार के लिए कैसे प्रेम जैसी पवित्र भावना का दुरुपयोग हो सकता है, फिल्म इसे गहनता के साथ उकेरती है।

फिल्म के डायलॉग और बेहतर हो सकते थे। मगर कहानी के अलावा द कन्वर्जन (The Conversion) का सबसे सशक्त पक्ष है, हीरोइन का पात्र निभाने वाली अभिनेत्री का अभिनय। मुझे नहीं मालूम कि अभिनेत्री विंध्य तिवारी ने इससे पहले कौन से फिल्म की है। मगर बाप रे बाप क्या अभिनय क्षमता है इस अभिनेत्री में। एक ही किरदार में अनेक कठिन भाव बड़ी कुशलता के साथ उसने निभाए हैं। एक बिंदास भरी उत्श्रंखलता से लेकर असहनीय अत्याचार और दर्द सहने वाली नायिका का सशक्त अभिनय विंध्य तिवारी ने किया है। सच मानिए तो हीरोइन की शुरुआती एंट्री इतनी अधिक प्रभावित नहीं करती पर जैसे फिल्म आगे बढ़ती है वैसे ही शृंगार, करुणा, भय, छल, क्रोध और रौद्र आदि कई जटिल भावों को वे बड़ी सहजता से निभाती नज़र आतीं हैं।

फिल्म के कई दृश्य बहुत भावपूर्ण है। मुझे सबसे सबसे अधिक मार्मिक दृश्य लगता है कि जब फिल्म में साक्षी बनी अभिनेत्री निकाह के समय अपना नाम बदलने को मज़बूर होती है। जिस गहराई के साथ सिर्फ अपनी आँखों के ज़रिए अपने साथ हुए अनजाने छल को विंध्य अभिनीत करती हैं, वह उनकी अभिनय क्षमता का नमूना है। हलाला की घृणित क्रूरता विचलित कर देने वाली है। निर्देशक की दाद देनी पड़ेगी कि वे इस दौरान आम मुम्बईया फिल्मों की तरह सेक्स दिखाने के लालच से बचे रहे। आप अपनी जवान होती बेटी के साथ फिल्म को देखने में असहज नहीं होते। बबलू शेख की भूमिका में प्रतीक शुक्ला ने भी जोरदार अभिनय किया है।

कुल मिलाकर एक नाज़ुक विषय पर बनी एक सशक्त फिल्म है – द कन्वर्जन (The Conversion)। मुद्दा विवादास्पद होने के साथ-साथ समीचीन भी है। फिल्म पर राजनीति होना भी अवश्यम्भावी है। निर्देशक विनोद तिवारी ने शुरू में बताया ही था कि उनकी फिल्म महीनों सेंसर बोर्ड में लटकी रही थी। देखा जाए तो मजहब, राजनीति, विवाद और स्त्री विमर्श- ये सब मिलकर बॉक्स ऑफिस पर इसकी सफलता की कहानी अभी से कह रहे हैं।

The Conversion: Movie Trailer

The Conversion: Public Review

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