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Tag Archives: Shabd Chitra Poems

Gopal Singh Nepali Hindi Bal-Kavita यह लघु सरिता का बहता जल

Gopal Singh Nepali Hindi Bal-Kavita यह लघु सरिता का बहता जल

यह लघु सरिता का बहता जल‚ कितना शीतल‚ कितना निर्मल। हिमगिरि के हिम निकल–निकल‚ यह विमल दूध–सा हिम का जल‚ कर–कर निनाद कलकल छलछल‚ बहता आता नीचे पल–पल। तन का चंचल‚ मन का विह्वल। यह लघु सरिता का बहता जल। निर्मल जल की यह तेज धार‚ करके कितनी श्रृंखला पार‚ बहती रहती है लगातार‚ गिरती–उठती है बार बार। रखता है …

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अभी तो झूम रही है रात – गिरिजा कुमार माथुर

अभी तो झूम रही है रात - गिरिजा कुमार माथुर

बडा काजल आँजा है आज भरी आखों में हलकी लाज। तुम्हारे ही महलों में प्रान जला क्या दीपक सारी रात निशा का­सा पलकों पर चिन्ह जागती नींद नयन में प्रात। जगी–सी आलस से भरपूर पड़ी हैं अलकें बन अनजान लगीं उस माला में कैसी सो न पाई–सी कलियाँ म्लान। सखी, ऐसा लगता है आज रोज से जल्दी हुआ प्रभात छिप …

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सुप्रभात – प्रभाकर शुक्ल

सुप्रभात - प्रभाकर शुक्ल

नयन से नयन का नमन हो रहा है, लो उषा का आगमन हो रहा है। परत पर परत चांदनी कट रही है, तभी तो निशा का गमन हो रहा है। क्षितिज पर अभी भी हैं अलसाए सपने, पलक खोल कर भी, शयन हो रहा है। झरोखों से प्राची कि पहली किरण का, लहर से प्रथम आचमन हो रहा है। हैं …

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भोर हुई – रूप नारायण त्रिपाठी

भोर हुई - रूप नारायण त्रिपाठी

भोर हुई पेड़ों की बीन बोलने लगी, पत पात हिले शाख शाख डोलने लगी। कहीं दूर किरणों के तार झनझ्ना उठे, सपनो के स्वर डूबे धरती के गान में, लाखों ही लाख दिये ताारों के खो गए, पूरब के अधरों की हल्की मुस्कान में। कुछ ऐसे पूरब के गांव की हवा चली, सब रंगों की दुनियां आंख खोलने लगी। जमे …

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भीग रहा है गाँव – अखिलेश कुमार सिंह

भीग रहा है गाँव - अखिलेश कुमार सिंह

मुखिया के टपरे हरियाये बनवारी के घाव सावन की झांसी में गुमसुम भीग रहा है गाँव धन्नो के टोले का तो हर छप्पर छलनी है सब की सब रातें अब तो आँखों में कटनी हैं चुवने घर में कहीं नहीं खटिया भर सूखी ठाँव निंदियारी आँखें लेकर खेतों में जाना है रोपाई करते करते भी कजली गाना है कीचड़ में …

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भैंसागाड़ी – भगवती चरण वर्मा

भैंसागाड़ी - भगवती चरण वर्मा

चरमर चरमर चूं चरर–मरर जा रही चली भैंसागाड़ी! गति के पागलपन से प्रेरित चलती रहती संसृति महान्‚ सागर पर चलते है जहाज़‚ अंबर पर चलते वायुयान भूतल के कोने–कोने में रेलों ट्रामों का जाल बिछा‚ हैं दौड़ रहीं मोटरें–बसें लेकर मानव का वृहद ज्ञान। पर इस प्रदेश में जहां नहीं उच्छ्वास‚ भावनाएं‚ चाहें‚ वे भूखे‚ अधखाये किसान भर रहे जहां …

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बसंती हवा – केदार नाथ अग्रवाल

बसंती हवा - केदार नाथ अग्रवाल

हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ। सुनो बात मेरी – अनोखी हवा हूँ। बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्त्मौला। नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ। न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ। …

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बांसुरी दिन की – माहेश्वर तिवारी

बांसुरी दिन की - माहेश्वर तिवारी

होंठ पर रख लो उठा कर बांसुरी दिन की देर तक बजते रहें ये नदी, जंगल, खेत कंपकपी पहने खड़े हों दूब, नरकुल, बेंत पहाड़ों की हथेली पर धूप हो मन की। धूप का वातावरण हो नयी कोंपल–सा गति बन कर गुनगुनाये ख़ुरदुरी भाषा खुले वत्सल हवाओं की दूधिया खिड़की। ∼ माहेश्वर तिवारी

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बातें – धर्मवीर भारती

बातें - धर्मवीर भारती

सपनों में डूब–से स्वर में जब तुम कुछ भी कहती हो मन जैसे ताज़े फूलों के झरनों में घुल सा जाता है जैसे गंधर्वों की नगरी में गीतों से चंदन का जादू–दरवाज़ा खुल जाता है बातों पर बातें, ज्यों जूही के फूलों पर जूही के फूलों की परतें जम जाती हैं मंत्रों में बंध जाती हैं ज्यों दोनों उम्रें दिन …

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अरसे के बाद – राजीव कृष्ण सक्सेना

अरसे के बाद - राजीव कृष्ण सक्सेना

अरसे के बाद गगन घनदल से युक्त हुआ अरसे के बाद पवन फिर से उन्मुक्त हुआ अरसे के बाद घटा जम कर‚ खुल कर बरसी सोंधा–सोंधा सा मन धरती का तृप्त हुआ दूर हुए नभ पर लहराते कलुषित साए भूली मुस्कानों ने फिर से पर फैलाए बरसों से बन बन भटके विस्मृत पाहुन से बीते दिन लौट आज वापस घर …

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