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Tag Archives: Life And Time Poems

दोस्ती के नाम एक कविता: सब दोस्त थकने लगे है

दोस्ती के नाम एक कविता: सब दोस्त थकने लगे है

साथ-साथ जो खेले थे बचपन में, वो सब दोस्त अब थकने लगे है, किसी का पेट निकल आया है, किसी के बाल पकने लगे है। सब पर भारी ज़िम्मेदारी है, सबको छोटी मोटी कोई बीमारी है, दिनभर जो भागते दौड़ते थे, वो अब चलते चलते भी रुकने लगे है, उफ़ क्या क़यामत हैं, सब दोस्त थकने लगे है। किसी को …

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Hindi Poem about Demonetization & New Year गया साल

Hindi Poem about Demonetization & New Year गया साल

यूँ तो हर साल गुजर जाता है अबकी कुछ बात ही निराली है कुछ गए दिन बहुत कठिन गुजरे मन मुरादों की जेब खाली है। कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी पहली कली है डाली पर दिल में कुछ अजब सी उमंगें हैं और नजरें सभी की माली पर कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी खुशबू …

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Hindi Wisdom poem from Father to Son बाप का कंधा

Hindi Wisdom poem from Father to Son बाप का कंधा

मेरे कंधे पर बैठा मेरा बेटा जब मेरे कंधे पर खड़ा हो गया मुझसे कहने लगा देखो पापा मैं तुमसे बड़ा हो गया मैंने कहा बेटा – इस गलत फ़हमी में भले ही जकड़े रहना मगर मेरा हाथ पकड़े रहना जिस दिन यह हाथ छूट जाएगा बेटा तेरा रंगीन सपना भी टूट जाएगा दुनिया वास्तव में उतनी हसीन नहीं है …

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Ramdhari Singh Dinkar Desh Prem Nostalgia Poem रे प्रवासी जाग

Ramdhari Singh Dinkar Desh Prem Nostalgia Poem रे प्रवासी जाग

रे प्रवासी‚ जाग‚ तेरे देश का संवाद आया। भेदमय संदेश सुन पुलकित खगों ने चंचु खोली‚ प्रेम से झुक–झुक प्रणति में पादपों की पंक्ति डोली। दूर प्राची की तटी से विश्व के तृण–तृण जगाता‚ फिर उदय की वायु का वन में सुपरिचित नाद आया। रे प्रवासी‚ जाग‚ तेरे देश का संवाद आया। व्योम–सर में हो उठा विकसित अरुण आलोक शतदल‚ …

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Bekal Utsahi Hindi Poem about Drought कब बरसेगा पानी

कब बरसेगा पानी – बेकल उत्साही

सावन भादौं साधु हो गए, बादल सब संन्यासी पछुआ चूस गई पुरवा को, धरती रह गई प्यासी फसलों ने वैराग ले लिया, जोगी हो गई धानी राम जाने कब बरसेगा पानी ताल तलैया माटी चाटै, नदियाँ रेत चबाएँ कुएँ में मकड़ी जाला ताने, नहरें चील उड़ाएँ उबटन से गगरी रूठी है, पनघट से बहुरानी राम जाने कब बरसेगा पानी छप्पर …

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Suryakumar Pandey Inspirational Hindi Poem मेरा खरापन शेष है

मेरा खरापन शेष है – सूर्यकुमार पांडेय

गांव में मैैं गीत के आया‚ मुझे ऐसा लगा‚ मेरा खरापन शेष है। वृक्ष था मैं एक‚ पतझड़ में रहा मधुमास सा‚ पत्र–फल के बीच यह जीवन जिया सन्यास सा‚ कोशिशें बेशक मुझे जड़ से मिटाने को हुईं‚ मेरा हरापन शेष है। सीख पाया मैं नहीं इस दौर जीने की कला‚ धोंट पाया स्वार्थ पल को भी नहीं मेरा गला‚ …

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Agyeya Contemplation Poem on Lost Love प्राण तुम्हारी पदरज फूली

प्राण तुम्हारी पदरज फूली मुझको कंचन हुई तुम्हारे चंचल चरणों की यह धूली! आईं थीं तो जाना भी था – फिर भी आओगी‚ दुख किसका? एक बार जब दृष्टिकरों से पदचिन्हों की रेखा छू ली! वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी‚ गीत शब्द का कब अभिलाषी? अंतर में पराग सी छाई है स्मृतियों की आशा धूली! प्राण तुम्हारी पदरज फूली! ∼ …

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Hindi Poem about coming home – जब मैं घर जाती हूँ

Hindi Poem about coming home - जब मैं घर जाती हूँ

आजकल जब मैं घर जाती हूँ, एक वासंती पवन मेरी जानिब चली आती है। घेर लेती है मुझे अपने आगोश में, जिन्दगी हर ओर मुस्कुराती है। मैं महकने लगती हूँ, इक खनकती घण्टियों सी हँसी घर को मंदिर बना देती है। वो चमकीली आँखों वाली मेरी लाडली मेरे जीवन की अखंड बाती है। ~ उषा रावत

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Haryanavi poem on lost Indian culture ढूंढते रह जाओगे

Haryanavi poem on lost Indian culture ढूंढते रह जाओगे

लुगाईयाँ का घाघरा खिचड़ी का बाजरा सिरसम का साग सर पै पाग आँगण मै ऊखल कूण मै मूसल ढूंढते रह जाओगे! घरां मै लस्सी लत्ते टाँगण की रस्सी आग चूल्हे की संटी दुल्हे की कोरडा होली का नाल मौली का पहलवानां का लंगोट हनुमानजी का रोट ढूंढते रह जाओगे! घूंघट आली लुगाई गाँम मै दाई लालटेण का चानणा बनछटीयाँ का …

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साकेत: कैकेयी का पश्चाताप – मैथिली शरण गुप्त – Kaikeyi’s Remorse

साकेत: कैकेयी का पश्चाताप - मैथिली शरण गुप्त - Kaikeyi's Remorse

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।” चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी स्वर को। बैठी थी अचल तदापि असंख्यतरंगा, वह सिन्हनी अब थी हहा गोमुखी गंगा। “हाँ, जानकर भी मैंने न भरत को जाना, सब सुनलें तुमने स्वयम अभी यह माना। यह सच है तो घर लौट चलो तुम भैय्या, अपराधिन मैं हूँ तात्, तुम्हारी मैय्या।” “यदि …

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