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Tag Archives: Desh Prem Poems

हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर Hindi poem on Netaji Subhash Chandra Bose

हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर Hindi poem on Netaji Subhash Chandra Bose

परमवीर निर्भीक निडर, पूजा जिनकी होती घर घर, भारत मां के सच्चे सपूत, हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर। सन अट्ठारह सौ सत्तानवे, नेता जी महान थे जन्मे, कटक ओडिशा की धरती पर, तेईस जनवरी की शुभ बेला में। देशभक्तों के देशभक्त, दूरंदेश थे अति शशक्त, नारा जय हिन्द का देकर बोले, आजादी दूंगा तुम देना रक्त। आजादी की लड़ी लड़ाई, …

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Hindi Poem about Demonetization & New Year गया साल

Hindi Poem about Demonetization & New Year गया साल

यूँ तो हर साल गुजर जाता है अबकी कुछ बात ही निराली है कुछ गए दिन बहुत कठिन गुजरे मन मुरादों की जेब खाली है। कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी पहली कली है डाली पर दिल में कुछ अजब सी उमंगें हैं और नजरें सभी की माली पर कि एक फूल जिसका इंतजार सबको था उसकी खुशबू …

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Children’s Hindi Patriotic Poem by Shamsher Bahadur भारत गुण–गौरव

Children's Hindi Patriotic Poem by Shamsher Bahadur भारत गुण–गौरव

मैं भारत गुण–गौरव गाता, श्रद्धा से उसके कण–कण को, उन्नत माथ नवाता। प्र्रथम स्वप्न–सा आदि पुरातन, नव आशाओं से नवीनतम, चिर अजेय बलदाता। आर्य शौर्य धृति, बौद्ध शांति द्युति, यवन कला स्मिति, प्राच्य कार्म रति, अमर, अभय प्रतिभायुत भारत चिर रहस्य, चिर ज्ञाता। वह भविष्य का प्रेम–सूत है, इतिहासों का मर्म पूत है, अखिल राष्ट्र का श्रम, संचय, तपः कर्मजयी, …

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Ramdhari Singh Dinkar Old Classic Poem about Himalayas मेरे नगपति! मेरे विशाल!

Ramdhari Singh Dinkar Old Classic Poem about Himalayas मेरे नगपति! मेरे विशाल!

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार दिव्य गौरव विराट्, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम–किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल! युग–युग अजेय, निर्बन्ध मुक्त, युग–युग शुचि, गर्वोन्नत, महान्, निस्सीम व्योम में तान रहा युग से किस महिमा का वितान्? कैसी अखण्ड यह चिर समाधि? यतिवर! यह कैसा अमिट ध्यान? तू महा शून्य में खोज रहा …

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Ramdhari Singh Dinkar Desh Prem Nostalgia Poem रे प्रवासी जाग

Ramdhari Singh Dinkar Desh Prem Nostalgia Poem रे प्रवासी जाग

रे प्रवासी‚ जाग‚ तेरे देश का संवाद आया। भेदमय संदेश सुन पुलकित खगों ने चंचु खोली‚ प्रेम से झुक–झुक प्रणति में पादपों की पंक्ति डोली। दूर प्राची की तटी से विश्व के तृण–तृण जगाता‚ फिर उदय की वायु का वन में सुपरिचित नाद आया। रे प्रवासी‚ जाग‚ तेरे देश का संवाद आया। व्योम–सर में हो उठा विकसित अरुण आलोक शतदल‚ …

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Jaishankar Prasad Inspirational Desh Bhakti Poem हिमाद्रि तुंग शृंग से

Jaishankar Prasad Inspirational Desh Bhakti Poem हिमाद्रि तुंग शृंग से

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती– स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती– ‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’ असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्यदाह-सी, सपूत मातृभूमि के– रुको न शूर साहसी! अराति सैन्य–सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो, प्रवीर हो, जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो! ∼ जयशंकर प्रसाद

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Girija Kumar Mathur Inspirational Desh Prem Poem पंद्रह अगस्त: 1947

पंद्रह अगस्त: 1947 - गिरिजा कुमार माथुर

आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना! खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना! प्रथम चरण है नए स्‍वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मन्‍थन से उठ आई पहली रत्‍न हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन मुक्‍ता डोर क्‍योंकि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अम्‍बुधि महान रहना पहरुए, सावधान …

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Gopal Prasad Vyas Inspirational Patriotic Hindi Poem खूनी हस्‍ताक्षर

Gopal Prasad Vyas Inspirational Patriotic Hindi Poem खूनी हस्‍ताक्षर

Neta Ji Subhash Chandra Bose organized the Indian National Army in early 1940s to fight the foreign occupation of the country. He promised freedom for the country but demanded full dedication of the people to this end. I am thankful to an unnamed reader who sent me a scanned copy of this lovely poem. This is a remarkable poem that …

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Rashtrakavi Maithili Sharan Gupt Classic Desh Prem Poem मातृभूमि

Rashtrakavi Maithili Sharan Gupt Classic Desh Prem Poem मातृभूमि

नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है। सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥ नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं। बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥ करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की। हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥ जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं। घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥ परमहंस सम …

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Kanhaiyalal Sethia Rajasthani Classic Poem about Rana Pratap पीथल और पाथल

Kanhaiyalal Sethia Rajasthani Classic Poem about Rana Pratap पीथल और पाथल

अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो। नान्हो सो अमरयो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो। हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो मेवाड़ी मान बचावण नै, हूं पाछ नहीं राखी रण में बैर्यां री खात खिडावण में, जद याद करूँ हळदीघाटी नैणां में रगत उतर आवै, सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै, …

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