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होली - डॉ. मंजरी शुक्ला

होली – डॉ. मंजरी शुक्ला

जिस दिन से जंगल के जानवरों और पक्षियों ने सुना था कि होली आने वाली हैं सबके मन में ख़ुशी और उल्लास छा गया था। उन्होंने इससे पहले कभी होली मनाई नहीं थी पर मिंकू बन्दर के शहर से लौटने के बाद से वो सभी होली मनाने की तैयारों में जुट गए थे और इसी वजह से मिंकू बन्दर आजकल जंगल के सभी जानवरों का हीरो बन गया था। जब वह एक डाल से दूसरी डाल पर कूदता हुआ सभी जानवरों को रंगबिरंगे रंगों और पिचकारियों के बारें में बताता तो सभी के चेहरे ख़ुशी सेचमकने लगते। कई दिनों की मीटिंग और बहस के बाद आखिर महाराज शेर सिंह ने जंगल में धूमधाम से होली मनाने का निर्णय ले ही लिया। तो अब सबने जंगल की एक मात्र बिन्नी गाय से नए कपड़े सिलवाने शुरू कर दिए।

कहाँ तो बेचारी बिन्नी की दुकान के आगे कोई झाँकता भी नहीं था क्योंकि उसे ठीक से कपड़े सिलना आता ही नहीं था पर किसके पास इतनी फुर्सत थी कि मिंकू के हाथों शहर से कपड़े मंगवाएँ। तो फैसला ये हुआ कि बिन्नी फटाफट होली तक कपड़े सिल के दे भी देगी। बिन्नी जो एक आँख से कानी भी थी, आजकल बहुत खुश थी और मन ही मन सोच रही थी कि रोज होली आये और उसके मजे हो जाए। दूसरी ओर बिन्नी से भी ज्यादा कोई खुश था तो वो था बम्पी भालू, जो बहुत ही बेस्वाद मिठाई बनाता था। जब तक जानवर आँख खोलकर देख नहीं लेते थे तब तक वे बेचारे बालूशाही और इमरती में फर्क नहीं कर पाते थे और इसलिए उसकी दुकान में सिवा मक्खियों के साल भर कोई नहीं आता था और वो सारा दिन बैठकर मक्खियाँ मारा करता था। हाँ, इसका इतना फायदा उसे जरुर हुआ था कि वो शहर में आयोजित “मक्खी मार प्रतियोगिता” में दो बार इनाम जीतकर आ चुका था और मजे की बात ये कि उसे इनाम में भी मक्खियाँ मारने का जाल ही मिला था। खैर इस तरह से कइयों की बंद पड़ी दुकान अब चल उठी थी और वे सब मन ही मन मिंकू बन्दर को धन्यवाद कर रहे थे जिसने शहर से आकर होली मनाने के लिए जंगल वालों को तैयार किया। सबने एक एक पल करके किसी तरह होली का इंतज़ार किया। होली के एक दिन पहले मिंकी ने बताया – “कल सुबह हम सब राजा शेर सिंह के यहाँ एकत्रित होंगे और जमकर होली खेलेंगे”।

सभी जानवर ये बात सुनकर ख़ुशी से झूम उठे।

दूसरे दिन सभी जानवर सूरज के उगने से पहले ही शेर सिंह के यहाँ पहुँच गए और धमा चौकड़ी मचाने लगे।

कुछ ही देर में मानों नीले, लाल हरे और पीले रंगों से आसमान ढक गया और सभी जानवर रंग बिरंगें चेहरों में पुत गए। हँसी और ठहाकों के बीच कब दोपहर हो गई किसी को पता ही नहीं चला।

तभी शेरसिंह वहाँ आकर हँसते हुए बोले – “अब सब लोग जाकर तालाब में अपना रंग छुड़ाओ और फिर यहाँ शाम को कठपुतली का नाच होगा”।

नटखट गिलहरी तो यह सुनकर ख़ुशी से फुदकने लगी और चीची बंदरियाँ जमीन पर गुलाटियाँ खाने लगी। ये देखकर सब अपना पेट पकड़ कर जोरो से हँसने लगे।

शाम को सभी जानवर और पक्षी जब सब सज संवर कर नए कपड़े पहनकर आये तो जैसे हँसी का ठहाका फूट पड़ा। मिन्नी गाय ने किसी के कपड़े छोटे तो किसी के बहुत ही लंबे सिल दिए थे। हीरामन तोता तो अपने लम्बे से हरे कोट में जैसे कहीं छुप गया था और नटखट गिलहरी बड़ी मुश्किल से अपनी फ्रॉक से जैसे गला निकाल कर देख पा रही थी। जंबो हाथी की शर्ट इतनी टाईट थी कि वो बेचारा ठीक से हिल डुल भी नहीं नहीं पा रहा था, पर सभी एक दूसरे के कपड़े देखकर बहुत हँस रहे थे इसलिए सभी उन बेढंगे कपड़ों में भी खुश हो रहे थे। राजा शेर ने सबको बैठाया और स्वादिष्ट मिठाइयां खिलाई। उसके बाद कठपुतली का नाच शुरू हुआ। डिम्पी मैना ने कठपुतली के धागे हिलाने शुरू किये और एक कठपुतली थी जो कि प्रहलाद बनी थी, तुरंत मटक मटक नाचने लगी और फिर वो कागज की बनी हुई होलिका की गोद में बैठ गई। पलक झपकते ही होलिका धू धू कर के जल उठी और प्रह्लाद बनी कठपुतली वापस मटकते हुए अपनी जगह पर चली गई। ये देखकर सभी हक्के बक्के रह गए और बच्चों की तरह खुश होकर तालियाँ बजाने लगे।

पिंकू हिरन से तो रहा ही नहीं गया और वो बोला – “हम लोगो को मिंकू बन्दर को थैंक्यू कहना चाहिए वरना हम इतना मजेदार और रंग बिरंगा त्यौहार कभी मना ही नहीं पाते”।

मिंकू ने खुश होकर अपना लाल कोट ठीक किया और मुस्कुराने लगा।

तभी मिंकू बोला – “सबसे ज्यादा तो बधाई के पात्र आप हैं महाराज, जो आपने शहर से मिठाई मँगवाली… वरना अगर हम बम्पी हलवाई की मिठाइयाँ खाते तो जान ही ना पाते कि हम रसगुल्ला खा रहे हैंया लड्डू।

मिंकू के यह कहते ही वहाँ हँसी का फव्वारा फूट पड़ा और इस हँसी में बम्पी हलवाई के ठहाके सबसे तेज थे जो अपने दोनों हाथों में लड्डू लिए बैठा हुआ था।

~ डॉ. मंजरी शुक्ला

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