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ज्वालामुखी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

ज्वालामुखी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

विश्व विख्यात शक्तिपीठ श्री ज्वालामुखी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जनपद के कालीधार के जंगलों में विराजमान एक ऐसा मनोरम व सुंदर शक्तिस्थल है जहां मां की पवित्र व अखंड ज्योतियों के दर्शन मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

मान्यता है कि जहां बिना घी तेल या इंधन से निरंतर सदियों से जलती चली आ रही इन दिव्य शीतल ज्योतियों की आभा ही कुछ निराली है। अग्नि रूप में प्रज्जवलित होने के बावजूद इन ज्योतियों में मां की ममता व मामत्व की शालीनता महसूस की जाती है। हर साल लाखों लोगों की मन की मुरादें पूरी करने वाली मां ज्वाला जी देश विदेश के करोड़ों भक्तों की आस्था का केन्द्र है। अब पलक झपकते ही मां ज्वाला के द्वार पहुंचा जा सकता है।

आज पूरे विश्व में एक बटन दबाते ही इंटरनेट के माध्यम से ज्वालामुखी मन्दिर में होने वाली आरतियों की  झलक देखी जा सकती है। आज इस मन्दिर की मान्यता इतनी है कि विश्व भर से मां के भक्त यहां आते है और मनचाहे मनोरथ हासिल कर झोलियां भर के जाते है। पूरे विश्व में ऐसा प्रत्यक्ष दर्शन ज्योतियों के रूप में कहीं नहीं होता यही कारण है कि मां की महिमा अपरंपार है।

यह है पौराणिक कथा

एक कहानी के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री पार्वती का विवाह भगवान शिव शंकर से हुआ था एक बार राजा दक्ष एक महायज्ञ का आयोजन करता है तथा हर देवी देवता को उसमें आमंत्रित करता है परंतु अपने दामाद भगवान शंकर व पुत्री पार्वती को आमंत्रित नहीं करता जिस पर माता पार्वती भगवान शंकर के बारंबार मना करने पर भी अपने पिता के घर चली जाती है परंतु अपने पिता के मुंह से पति की निंदा माता पार्वती सुन नहीं पाती है वह जलते हुए हवन कुंड में छलांग लगाकर आत्मदाह कर लेती है।

इससे पूरी श्रृष्टि में हाहाकार मच जाता है भगवान शंकर तक जब समाचार पहुंचता है तो वे क्रोधित हो उठते है उन्होंने अपने गणों को बुला कर यज्ञ को विध्वंस कर दक्ष का सिर काट देने की आज्ञा दी गणों ने यज्ञ को विध्वंस कर भगवान शंकर की आज्ञा के अनुसार दक्ष का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया जिस पर सभी देवताओं के आग्रह पर व स्तुति गान पर भगवान शंकर ने दक्ष को बकरे का सिर लगा कर जीवित किया।

वहीं सती के अधजले शरीर को उठा कर सृष्टि का भ्रमण करने लगे हाहाकार मच गया। तब श्री हरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े काट दिए जहां-जहां सती के शरीर के टुकड़े गिरे वहीं शक्तिपीठ बन गए उन सभी शक्तिपीठों के साथ भगवान शंकर के मन्दिर भी स्थापित हो गए। ज्वाला जी मन्दिर में सती की जीभ गिरी थी जिससे ज्वाला निकल रही थी इसलिए ही इस स्थान का नाम ज्वालामुखी पड़ा है।

राजा भूमिचंद ने यहां के मन्दिर की जीर्णाेद्वार करवाया था उसे एक ग्वाले ने बताया कि जंगल में आग की लपटें जलती दिखाई दे रही है तब राजा भूमि चंद को रात का स्वप्न हुआ कि यहां पर मन्दिर बनाओ तुम्हारे वंश का सदा कल्याण होगा राजा भूमि चंद ने मां की दरबार बनाया तथा शाक द्वीप से दो भोजक ब्राहम्ण मां की पूजा अराधना के लिए लाकर यहां मां की पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा अर्चना करके परिवार का पालन पोषण करने को कहा।

उसी परिवार के वंशज आज डेढ़ सौ के लगभग परिवार हो चुके है जो आज भी विशेष पूजा पद्वति से मां की पूजा अराधना पीढ़ी दर पीढ़ी करते चले आ रहे है तथा विश्व शांति व जन कल्याण के लिए साल में दो बार मां की जन्म दिवस व भंडारे का स्वयं अपनी निधि से आयोजन करते है। ताकि मां की कृपा हमेशा सब पर बनी रहे।

कैसे पहुंचे मंदिर तक: ज्वालामुखी मन्दिर में बस के माध्यम से पठानकोट,चंडीगढ़ से आ सकते है रेल के माध्यम से पठानकोट से यहां आ सकते है। हवाई जहाज से आना हो तो गग्गल एयरपोर्ट से ज्वालामुखी के लिए टैक्सी या बस मिल जाती है यहां ठहरने के लिए कई अच्छे होटल सराय है। मन्दिर न्यास के सौजन्य से यात्रियों के लिए काफी सुविधायें उपलब्ध है। शहर चारों ओर की पहाड़ियों से घिरा हुआ रमणीय स्थल है यहां कई छोटे मन्दिर तारा देवी मन्दिर, अंबिकेश्वर मन्दिर, टेड़ा मन्दिर, अर्जुन नांगा मन्दिर, गणेश मन्दिर, राधा कृष्ण मन्दिर गोरख डिब्बी मन्दिर व अन्य कई मन्दिर मौजूद है जहां मां की महिमा का गुणगान किया जाता है।

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