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उदास सांझ – मैत्रेयी अनुरूपा

दिनभर तपा धूप में थक कर‚
हो निढाल ये बूढ़ा सूरज‚
बैठ अधमरे घोड़ों पर – जो
डगमग गिर गिर कर उठते से
कदमों को बैसाखी पर रख‚
संध्या की देहरी पर आकर‚
लगता है गिरने वाले हैं।

पथ के मील‚ पांव के छाले
बन कर सारे फूट गये हैं‚
जिनसे बहता रक्त‚ सांझ की
अंगनाई में बिखर गया है‚
और दुशाला ओढ़ सुरमई‚
खड़ा द्वार पर टेक लगाये–
तिमिर‚ हाथ की मैली चादर
उसके ऊपर डाल रहा है।

एक कबूतर फिर शाखों पर
नया बिछौना बिछा रहा है।
एक और दिन बीत रहा है।
लेकिन मन की गहन उदासी
ढलती नहीं दिवस ढलने पर‚
बढ़ते हुए अंधेरे के संग
गहरी और हुई जाती है।

फौलादी सन्नाटा‚ कटता नहीं‚
तनिक कोशिश करती हूं–
और हार कर‚ थक कर मैं भी‚
कोहनी टिका मेज पर अपनी‚
मुट्ठी ठोड़ी पर रखती हूं‚
और शून्य में खो जाती हूं।

— मैत्रेयी अनुरूपा

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