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नाव चलती रही – वीरबाला भावसार

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

कौन सी रागनी बज रही है यहां
देह से अजनबी प्राण से अजनबी
क्या अजनबी रागनी के लिये
जिंदगी की त्वरा यूँ मचलती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

रुक गए यूँ कदम मुद के देखूं जरा
है वहां अब भी जिन्दा दिली ताज़गी
राह कोई भी पकड़ू वहां के लिये
राह हर एक बच कर निकलती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

हर सुमन खिल रहा है बड़ी शान से
हर चमन उस पे सौ जान से फ़िदा
तू सुमन भी नहीं, तू चमन भी नहीं
शाख पर एक मैना चहकती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

धुप भी वही, चांदनी भी वही
जिंदगी भी वही, बानगी भी वही
कौन जाने कि क्यों एक धुंधली परत
बीच में यूँ कुहासे सी तिरती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

वृद्ध पापा हुए, मां बहुत ढल गई
जिंदगी सांप सी फन पटकती रही
क्या हुआ एक पीढ़ी गुज़र भी गई
इक नई पौध उगती उमगती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

सत्य है वह सभी जो कि मैंने जिया
सत्य वह भी कि जो रह गया अन जिया
कौन से तट उतरना कहां है मुझे
एक पाती हवा में भटकती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

∼ डॉ. वीरबाला भावसार

About Veerbala Bhavsar

डॉ. वीरबाला भावसार (अक्टूबर 1931 – अगस्त 2010) स्वतंत्र्ता से पूर्व जन्मे रचनाकारों की उस पीढी से है, जिन्होंने प्रयोगवाद व प्रगतिवाद के दौर में अपनी रचना-यात्र प्रारम्भ की तथा आधुनिक मुक्त छंद की कविता तक विभिन्न सोपान से गुजरते हुए कविता कामिनी के सुकुमार स्वरूप को बनाए रखा। छायावादियों की तरह का एक रूमानी संसार कविता म बसाए रखना, इस प्रकार के रचनाकारों की विशिष्टता है। इस दौर में हिन्दी साहित्य में कई बडे रचनाकारों ने गद्य गीतों की रचना की। डॉ. वीरबाला भावसार द्वारा रचित इस संकलन की कुछ कविताओं यथा ‘भोर हुई है’, ‘मैं निद्रा में थी’, ‘वैरागिनी’, ‘तुलिका हूँ’ तथा ‘बाती जलती है’ आदि को गद्य गीत या गद्य काव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।

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