Home » Poems For Kids » Poems In Hindi » नाम बड़े हस्ताक्षर छोटे – काका हाथरसी

नाम बड़े हस्ताक्षर छोटे – काका हाथरसी

प्रगति राष्टभाषा करे, यह विचार है नेक
लेकिन आई सामने, विकट समस्या एक
विकट समस्या एक, काम हिंदी में करते
किंतु र्शाट में हस्ताक्षर, करने से डरते
बोले ‘काशी नाथ’ ज़रा हमको बतलाना
दोनो आँखे होते हुए, लिंखू मैं ‘काना’?

इसी तरह से और भी, कर सकते हैं तर्क
प्रोफेसर या प्रिंसिपल, अफसर, बाबू, क्लर्क
अफसर, बाबू, क्लर्क, होय गड़बड़ घोटाला
डाक्टर ‘नाथू लाल’ करें हस्ताक्षर ‘नाला’
कह ‘काका’ बतलाओ क्या संभव है ऐसा
लाला भैंरो साह लिखें अपने को भैंसा।

परिवर्तन घनघोर हो, बदल जाएँगी कौम
डौंगर मल संक्षिप्त में, लिखे जाएँगे डौंम
लिखे जाएँगें डौंम, नाम असली खो जाएँ
गुप्पो मल को शार्ट करो तो, गुम हो जाएँ
उजले कांती लाल किंतु कहलाएँ काला
भैय्या भाई लाल पुकारे जाएँ भाला।

अच्छे–अच्छे नाम भी हो जाएँ बदनाम
जब की हरिहर राम को, लिखना पड़े हराम
लिखना पड़े हराम, किसी का क्या कर लेंगे
चिढ़ा–चिढ़ा कर गज धारी को गधा कहेंगे
कह ‘काका’ कवि बाबू लाल बनेंगे बाला
पंडित प्यारे लाल, लिखे जाएँगे प्याला।

हिंदू ईश्वर दत्त हैं, वे लिक्खेंगे ईद
लाला लीला दत्त जी, बन जाएँगे लीद
बन जाएँगे लीद, मज़े तो तब आएंगे
तेजपाल लीडर, जब तेली कहलाएँगे
कह ‘काका’ कवि होली लाल बनेंगे होला
बाबू छोटे लाल लिखे जाएँगे छोला।

जान बूझकर व्यर्थ ही, क्यों होते बदनाम
उतना दुखदायी बने, जितना लंबा नाम
जितना लंबा नाम, रखो छोटे से छोटा
दो अक्षर से अधिक नाम होता है खोटा
सूक्ष्म नाम पर कभी नहीं पड़ सकता डाका
‘काका’ को उलटो पलटो, फिर भी हैं ‘काका’।

∼ काका हाथरसी

About Kaka Hathrasi

काका हाथरसी (18 सितम्बर 1906 - 18 सितम्बर 1995) हास्य कवियों में विशिष्ट हैं। काका हाथरसी का जन्म हाथरस, उत्तर प्रदेश में प्रभुलाल गर्ग के रूप में एक अग्रवाल वैश्य परिवार में हुआ। उनकी शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही, आज भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। 1957 में पहली बार काका दिल्ली के लाल किले में आयोजित कवि-सम्मेलन में काका को आमंत्रित किया गया। सभी आमंत्रित कवियों से आग्रह किया गया था कि वे 'क्रांति' पर कविता करें क्योंकि सन् सतावन की शताब्दी मनाई जा रही थी। अब समस्या यह थी कि 'काका' ठहरे 'हास्य-कवि' अब वे 'क्रांति' पर क्या कविता करें? 'क्रांति' पर तो वीररस में ही कुछ हो सकता था। जब कई प्रसिद्ध वीर-रस के कवियों के कविता-पाठ के बाद 'काका' का नाम पुकारा गया तो 'काका' ने मंच पर 'क्रांति का बिगुल' कविता सुनाई। काका की कविता ने अपना झंडा ऐसा गाड़ा कि सम्मेलन के संयोजक गोपालप्रसाद व्यास ने काका को गले लगाकर मुक्तकंठ से उनकी प्रशंसा व सराहना की। इसके बाद काका हास्य-काव्य' के ऐसे ध्रुवतारे बने कि आज तक जमे हैं।

Check Also

मैं भारत का नागरिक हूँ - हास्य-व्यंग कविता

मैं भारत का नागरिक हूँ – हास्य-व्यंग कविता

मैं भारत का नागरिक हूँ, मुझे लड्डू दोनों हाथ चाहिये। बिजली मैं बचाऊँगा नहीं, बिल …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *