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न होते तुम, तो क्या होता – सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

न होते तुम, तो क्या होता…

न होता कहीं सावन, न होता कहीं उपवन,
न होता कहीं समर्पण, न होता कहीं आलिंगन।

Na Hote Tum To Kya Hotaन होती कहीं रुठन, न होती कहीं अड़चन,
न होती कहीं अनबन, न होती कहीं मनावन।

न खिलते कहीं फूल, न होते कहीं शूल,
न होती कहीं अमराई, न मन लेता अंगड़ाई।

न बदरा बनते बौझार, न झरना देता फुहार,
न कोहरा बनता धुंध, न प्रेमी लिपटते निर्दवन्द।

न सपर्श होता कोमल, न जलधार होती निर्मल,
न नृत्य करता मयूर, न कोयल गाती भरपूर।

न होती कोई आस्था, न मानता कोई प्रेम की व्यथा,
न बजती कोई बाँसुरी, छा जाती शक्तियाँ आसुरी।

न प्रकृति करती श्रँगार, न फूट पड़ते उद्गार,
न माझी सुनाता मल्हार, न बृह्म होता निराकार।

∼ सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

About Surinder Kumar Arora

हरियाणा स्थित जगाधरी में जन्मे सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा 32 वर्ष तक दिल्ली में जीव-विज्ञान के प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहने के उपरांत सेवानिवृत हुए हैं तथा वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लघुकथा, कहानी, बाल - साहित्य, कविता व सामयिक विषयों पर लेखन में संलग्न हैं। आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, यथा “आज़ादी”, “विष-कन्या”, “तीसरा पैग” (सभी लघुकथा संग्रह), “बन्धन-मुक्त तथा अन्य कहानियाँ” (कहानी संग्रह), “मेरे देश की बात” (कविता संग्रह), “बर्थ-डे, नन्हे चाचा का” (बाल-कथा संग्रह) आदि। इसके अतिरिक्त कई पत्र-पत्रिकाओं में भी आपकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं तथा आपने कुछ पुस्तकों का सम्पादन भी किया है। साहित्य-अकादमी (दिल्ली) सहित कई संस्थाओं द्वारा आपकी कई रचनाओं को पुरुस्कृत भी किया गया है। डी - 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन, साहिबाबाद - 201005 ( ऊ . प्र.) मो.न. 09911127277 (arorask1951@yahoo.com)

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