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मास्टर की छोरी – प्रतिभा सक्सेना

विद्या का दान चले, जहाँ खुले हाथ
कन्या तो और भी सरस्वती की जात
और सिर पर पिता मास्टर का हाथ।

कंठ में वाणी भर, पहचान लिये अक्षर
शब्दों की रचना, अर्थ जानने का क्रम
समझ गई शब्दों के रूप और भाव
और फिर शब्दों से आगे पढ़े मन
जाने कहाँ कहाँ के छोर, गहरी गहरी डूब तक
बन गया व्यसन,
मास्टर की छोरी।

पराये लगे न कभी, लड़के हर बार नये
घर में आ कर रह जाते, माता का मन उदार
भूख-प्यास जान रही, अक्सर ही स्वेटर भी
पढ़-लिख, तैयार चरण छूते, बिदा होते
किसी को भी नहीं खला, कभी कमी नहीं पड़ी
यों ही बड़ी होती रही
मास्टर की छोरी।

एक दिन किसी ने कहा, उनके पास है ही क्या सिवा
फ़ालतू की बातों के और इन किताबों के
क्या अचार डालेगी
रीत-भाँत- दुनिया से कोरी
मास्टर की छोरी।

बुरा लगा, हुई दुखन, जान गई अपना सच
साध लिया बिछला मन
दुनिया को समझ रही
अपने से परख रही
मास्टर की छोरी।

ब्याह गई
नये लोग नये ढंग
कमरों वाला मकान, लोक- व्यवहार
सभी साज और सँवार
लेकिन किताबों बिन
सूनी सी लगतीं रही, भरी अल्मारियाँ
चाह उठे बार- बार
कभी एकांत खोज, मन चाही किताब खोल
पास धर लाई-चना देर तक पढ़ती रहे शांत
चुपचाप कहीं रुके अनायास
कुछ सोचती या गुनती रहे
मास्टर की छोरी।

पढ़ती सभी के मन, करने लगी जतन
साथ ले अकेलापन, कौन जाने वह चुभन
पाट नहीं पा रही
भीतर और बाहर के बीच बसी दूरी
मास्टर की छोरी।

∼ प्रतिभा सक्सेना

About Pratibha Saxena

जन्म: स्थान मध्य प्रदेश, भारत, शिक्षा: एम.ए, पी एच.डी., उत्तर कथा पुस्तकें: 1 सीमा के बंधन - कहानी संग्रह, 2. घर मेरा है - लघु-उपन्यास संग्रह .3. उत्तर कथा - खण्ड-काव्य. संपादन प्रारंभ से ही काव्यलेखन में रुचि, कवितायें, लघु-उपन्यास, लेख, वार्ता एवं रेडियो तथा रंगमंच के लिये नाटक रूपक, गीति-नाट्य आदि रचनाओं का साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन (विशाल भारत ,वीणा, ज्ञानोदय, कादंबिनी, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमेरिका से प्रकाशित, विश्व विवेक, हिन्दी जगत्‌ आदि में।) सम्प्रति : आचार्य नरेन्द्रदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कानपुर में शिक्षण. सन्‌ 1998 में रिटायर होकर, अधिकतर यू.एस.ए. में निवास. pratibha_saksena@yahoo.com

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