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खतरा है – मनोहर लाल ‘रत्नम’

देशवासियों सुनो देश को,
आज भयंकर खतरा है।
जितना बाहर से खतरा,
उतना भीतर से खतरा है॥

सर पर खरा चीन से है, लंका से खतरा पैरों में,
अपने भाई दिख रहे हैं, जो बैठे हत्यारों में।
इधर पाक से खतरा है तो, इधर बंग से खतरा है,
निर्भय होकर जो उठती सागर तरंग से खतरा है।
माँ के आँचल को खतरा, दुल्हन के घूंघट को खतरा है,
खतरे में पायल की छम – छम, लाश के है पट को खतरा।
बिछुए को भी खतरा है, तो मेंहदी भरती सिसकारी,
भाई बहन के प्यार की रक्षक, राखी पर है चिंगारी॥

प्यार के रिश्ते सब खतरे में,
बदकारों से खतरा है।
देशवासियों सुनो देश को,
आज भयंकर खतरा है॥

आज़ादी को खतरा देश के जहरीले इन शूलों से,
अपने हाथों हमने बोये, देखो आज बबूलों से।
उनके हाथों में लहराती देखो आज कतारों से,
जो गर्दन पर लटक रही है, खतरा है तलवारों से।
मंदिर को भी खतरा है, तो गुरुद्वारों को खतरा है,
मस्जिद, गिरजा के अब तो हर अँगनारों को खतरा है।
काशी – काबा को खतरा, तो खतरा आज देवालय को,
हरिद्वार को खतरा है तो खतरा आज हिमालय को॥

कश्मीर में आग लगी है,
बटवारों से खतरा है।
देशवासियों सुनो देश को,
आज भयंकर खतरा है॥

मानसिंह की बस्ती को भी, जयचंदों से खतरा है,
माथे पर जो तिलक लगाते, इन बन्दों से खतरा है।
हैं खतरे को बोल दीवाने, पूजा और अजानों में,
खतरा मानों है सच जानो, ख़ामोशी शमशानों में।
नाश-नाश के क्रम से पीड़ित, आज और कल को खतरा है,
मौन साध कर बैठा है जो, पांडव दाल को खतरा है।
देश मेरे को खतरा देश में उठते हुए सवालों से,
सच कहता हूँ देश को खतरा, देश को आज दलालों से॥

रात-रात भर हम जागे,
अब रखवारों से खतरा है।
देशवासियों सुनो देश को,
आज भयंकर खतरा है॥

घर-घर में उठते भैया, अब हर तनाव से खतरा है,
यमुना के पानी को सुन लो, अब चिनाव से ख़तरा है।
मैली गंगा को ख़तरा, खतरा सरयू के पानी को,
हम चुल्लू में डूब मरें, फिर आग लगे मर्दानी को।
कितने विषधर फन फैलाये, आज देश को दस्ते हैं,
ऐसा लगता देश में जैसे, सब मुर्दे ही बसते हैं।
खतरों की इस झंझा से तो छलनी अपना भेष हुआ,
बोलो ‘रत्नम’ कुछ तो बोलो, आज अपाहिज देश हुआ॥

दिल का खतरा देश हुआ,
अब रखवारों से खतरा है।
देशवासियों सुनो देश को,
आज भयंकर खतरा है॥

∼ मनोहर लाल ‘रत्नम’

About Manohar Lal Ratnam

जन्म: 14 मई 1948 में मेरठ में; कार्यक्षेत्र: स्वतंत्र लेखन एवं काव्य मंचों पर काव्य पाठ; प्रकाशित कृतियाँ: 'जलती नारी' (कविता संग्रह), 'जय घोष' (काव्य संग्रह), 'गीतों का पानी' (काव्य संग्रह), 'कुछ मैं भी कह दूँ', 'बिरादरी की नाक', 'ईमेल-फ़ीमेल', 'अनेकता में एकता', 'ज़िन्दा रावण बहुत पड़े हैं' इत्यादि; सम्मान: 'शोभना अवार्ड', 'सतीशराज पुष्करणा अवार्ड', 'साहित्य श्री', 'साहित्यभूषण', 'पद्याकार', 'काव्य श्री' इत्यादि

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