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कच्ची सड़क – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।

नीम की निबोलियाँ उछालती,
आम के टिकोरे झोरती,
महुआ, इमली और जामुन बीनती
जो तेरी इस पक्की सड़क पर घरघराती
मोटरों और ट्रकों को अँगूठा दिखाती थी,
उलझे धूल भरे केश खोले
तेज धार सरपत की कतारों के बीच
घूमती थी, कतराती थी, खिलखिलाती थी।
टीलों पर चढ़ती थी
नदियों में उतरती थी
झाऊ की पट्टियों में खो जाती थी,
खेतों को काटती थी
पुरवे बाँटती थी
हरी–धकी अमराई में सो जाती थी।

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।

गुदना गुदाए, स्वस्थ मांसल पिंडलियाँ थिरकाती
ढोल, मादल, बाँसुरी पर नाचती थी,
पलक झुका गीले केश फैलाए,
रामायण की कथा बाँचती थी,
ठाकुरद्वारे में कीर्तन करती थी,
आरती–सी दिपती थी
चंदन–सी जुड़ती थी
प्रसाद–सी मिलती थी
चरणामृत–सी व्याकुल होंठों से लगकर
रग–रग में व्याप जाती थी।

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।
अब वह कहाँ गयी।

किसने कहा उसे पक्की सड़क में बदल दो?
उसकी छाती बेलौस कर दो
स्याह कर दो यह नैसर्गिक छटा
विदेशी तारकोल से।
किसने कहा कि उसके हृदय पर
चोर बाज़ार का सामान ले जाने वाले
भारी भारी ट्रक चलें,
उसके मस्तिष्क में
चमचमाती मोटरों, स्कूटरों की भाग दौड़ हो
किसने कहा
कि वह पाकेटमार–सी मिले
दुर्घटना–सी याद रहे
तीखे विष–सी
ओठों से लगते ही रग–रग में फैल जाए।

सुनो ! सुनो !
यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी
जो मेरे गाँव को जाती थी।
आह! वह कहाँ गयी।

∼ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

About Sarveshwar Dayal Saxena

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (15 सितंबर 1927 – 23 सितंबर 1983) मूलतः कवि एवं साहित्यकार थे, पर जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। सर्वेश्वर मानते थे कि जिस देश के पास समृद्ध बाल साहित्य नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता। सर्वेश्वर की यह अग्रगामी सोच उन्हें एक बाल पत्रिका के सम्पादक के नाते प्रतिष्ठित और सम्मानित करती है। जन्म– 15 सितंबर 1927 को बस्ती में विश्वेश्वर दयाल के घर। शिक्षा– इलाहाबाद से उन्होंने बीए और सन 1941 में एमए की परीक्षा उत्तीर्ण की। कार्यक्षेत्र– 1941 में प्रयाग में उन्हें एजी आफिस में प्रमुख डिस्पैचर के पद पर कार्य मिल गया। यहाँ वे 1955 तक रहे। तत्पश्चात आल इंडिया रेडियो के सहायक संपादक (हिंदी समाचार विभाग) पद पर आपकी नियुक्ति हो गई। इस पद पर वे दिल्ली में वे 1960 तक रहे। सन 1960 के बाद वे दिल्ली से लखनऊ रेडियो स्टेशन आ गए। 1964 में लखनऊ रेडियो की नौकरी के बाद वे कुछ समय भोपाल एवं रेडियो में भी कार्यरत रहे। सन 1964 में जब दिनमान पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ तो वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' के आग्रह पर वे पद से त्यागपत्र देकर दिल्ली आ गए और दिनमान से जुड़ गए। 1982 में प्रमुख बाल पत्रिका पराग के सम्पादक बने। नवंबर 1982 में पराग का संपादन संभालने के बाद वे मृत्युपर्यन्त उससे जुड़े रहे। निधन– 23 सितंबर 1983 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

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