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जाने क्या हुआ – ओम प्रभाकर

जाने क्या हुआ कि दिन
काला सा पड़ गया।

चीज़ों के कोने टूटे
बातों के स्वर डूब गये
हम कुछ इतना अधिक मिले
मिलते–मिलते ऊब गये
आँखों के आगे सहसा–
जाला–सा पड़ गया।

तुम धीरे से उठे और
कुछ बिना कहे चल दिये
हम धीरे से उठे स्वयं को–
बिना सहे चल दिये
खुद पर खुद के शब्दों का
ताला सा पड़ गया।

जाने क्या हुआ कि दिन
काला सा पड़ गया।

∼ ओम प्रभाकर

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