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हमारा देश By Agyeya

Agyeya Desh Prem Hindi Poem about Indian Culture हमारा देश

इन्ही तृण – फूस – छप्पर से
ढके ढुलमुल गँवारू
झोंपड़ों में ही हमारा देश
बस्ता है।

इन्ही के ढोल – मादल – बांसुरी के
उमगते सुर में
हुनरी साधना का रस
बस्ता है।

इन्ही के मर्म को अनजान
शहरों की ढकी लोलुप विषैली
वासना का सांप
डंसता है।

इन्ही में लहराती अल्हड़
अपनी संस्कृति की दुर्दशा पर
सभ्यता का भूत
हँसता है।

~ सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन ‘अज्ञेय’

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