Home » Poems For Kids » Poems In Hindi » एक पूरा दिन – राजीव कृष्ण सक्सेना

एक पूरा दिन – राजीव कृष्ण सक्सेना

आज नहीं धन आशातीत कहीं से पाया‚
ना हीं बिछड़े साजन ने आ गले लगाया।

शत्रु विजय कर नहीं प्रतिष्ठा का अधिकारी‚
कुछ भी तो उपलब्धि नहीं हो पाई भारी।

साधारण सा दिन‚ विशेष कुछ बात नहीं थी‚
कोई जादू नहीं‚ नयन की घात नहीं थी।

झलक नहीं पाते जो स्मृति के आभासों में‚
जिक्र नहीं होता है जिनका इतिहासों में।

बेमतलब ही पथ पर जो जड़ते रहते हैं‚
भार उठा जिनका हम बस चलते रहते हैं।

सांझ तलक ऐसा ही दिन कुछ बीत रहा था‚
कोल्हू के बैलों सा मन बस खींच रहा था।

सांझ ढली फिर संध्या का जब दीप जलाया‚
जाने क्यों फिर अनायास मन भर–भर आया।

टीस हृदय में उठी‚ चली अंदर पुरवाई‚
मन के मेघों ने आंखों से झड़ी लगाई।

शून्य भावनाओं का सूखा निर्जन आंगन‚
जलमय उस जलधारा से संपूर्ण हो गया।

सांझ गए तक निपट अधूरा जो लगता था‚
साधारण वह दिवस अचानक पूर्ण हो गया।

∼ राजीव कृष्ण सक्सेना

About Rajiv Krishna Saxena

प्रो. राजीव कृष्ण सक्सेना - जन्म 24 जनवरी 1951 को दिल्ली मे। शिक्षा - दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में। एक वैज्ञानिक होने पर भी प्रोफ़ेसर सक्सेना को हिंदी सहित्य से विशेष प्रेम है। उन्होंने श्रीमद भगवतगीता का हिंदी में मात्राबद्ध पद्यानुवाद किया जो ''गीता काव्य माधुरी'' के नाम से पुस्तक महल दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुआ है। प्रोफ़ेसर सक्सेना की कुछ अन्य कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं मे छप चुकी हैं। उनकी कविताएँ लेख एवम गीता काव्य माधुरी के अंश उनके website www.geeta-kavita.com पर पढ़े जा सकते हैं।

Check Also

माँ - दिल छू जाने वाली हिंदी कविता

माँ – दिल छू जाने वाली हिंदी कविता

मै तेरा गुनेहगार हूँ माँ मै तुझे भूल गया उन झूठे रिश्तो के लिए जो …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *