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दुपहरिया – केदार नाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों­­–
सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक­सी गई प्रगति जीवन की।

सांस रोक कर खड़े हो गये
लुटे­–लुटे­ से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाहों में
भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को “चुर­–मुर” ध्वनि बांसों के बन की।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आंखों के इस वीराने में­­
और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की।

— केदार नाथ सिंह

About Kedar Nath Singh

केदार नाथ सिंह (जन्म 1934 ई.) हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि हैं। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष 2013 का 49 वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने का निर्णय किया गया। वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के 10 वें लेखक हैं। केदार नाथ सिंह का जन्म 1934 ई॰ में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ था। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 ई॰ में हिन्दी में एम॰ए॰ और 1964 में पी-एच॰ डी॰ की उपाधि प्राप्त की। वे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर आचार्य और अध्यक्ष काम कर चुके हैं। केदार नाथ सिंह को मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान आदि पुरस्कारों मिल चुके हैं।

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