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चले नहीं जाना बालम – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

यह डूबी डूबी सांझ उदासी का आलम‚
मैं बहुत अनमनी चले नहीं जाना बालम!

ड्योढ़ी पर पहले दीप जलाने दो मुझ को‚
तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझ को‚
मंदिर में घण्टे‚ शंख और घड़ियाल बजे‚
पूजा की सांझ संझौती गाने दो मुझको‚
उगने तो दो उत्तर में पहले ध्रुव तारा‚
पथ के पीपल पर आने तो दो उजियारा‚
पगडण्डी पर जल–फूल–दीप धर आने दो‚
चरणामृत जा कर ठाकुर जी की लाने दो‚
यह डूबी–डूबी सांझ उदासी का आलम‚
मैं बहुत अनमनी चले नहीं जाना बालम।

यह काली–काली रात बेबसी का आलम‚
मैं डरी–डरी सी चले नहीं जाना बालम।

बेले की पहले ये कलियां खिल जाने दो‚
कल का उत्तर पहले इन से मिल जाने दो‚
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गांठ पड़ी?
रजनीगंधा की ज्वार सुरभि को आने दो‚
इस नीम ओट से उपर उठने दो चंदा
घर के आंगन में तनिक रोशनी आने दो
कर लेने दो मुझको बंद कपाट ज़रा
कमरे के दीपक को पहले सो जाने दो‚
यह काली–काली रात बेबसी का आलम‚
मैं डरी–डरी सी चले नहीं जाना बालम।

यह ठण्डी–ठण्डी रात उनींदा सा आलम‚
मैं नींद भरी–सी चले नहीं जाना बालम।

चुप रहो जरा सपना पूरा हो जाने दो‚
घर की मैना को ज़रा प्रभाती गाने दो‚
खामोश धरा‚ आकाश दिशाएं सोई हैं‚
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोई हैं?
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो‚
मुझ को आंचल में हरसिंगार भर लेने दो‚
मिटने दो आंखों के आगे का अंधियारा‚
पथ पर पूरा–पूरा प्रकाश हो लेने दो।
यह ठण्डी–ठण्डी रात उनींदा सा आलम‚
मैं नींद भरी–सी चले नहीं जाना बालम।

∼ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

About Sarveshwar Dayal Saxena

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (15 सितंबर 1927 – 23 सितंबर 1983) मूलतः कवि एवं साहित्यकार थे, पर जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। सर्वेश्वर मानते थे कि जिस देश के पास समृद्ध बाल साहित्य नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता। सर्वेश्वर की यह अग्रगामी सोच उन्हें एक बाल पत्रिका के सम्पादक के नाते प्रतिष्ठित और सम्मानित करती है। जन्म– 15 सितंबर 1927 को बस्ती में विश्वेश्वर दयाल के घर। शिक्षा– इलाहाबाद से उन्होंने बीए और सन 1941 में एमए की परीक्षा उत्तीर्ण की। कार्यक्षेत्र– 1941 में प्रयाग में उन्हें एजी आफिस में प्रमुख डिस्पैचर के पद पर कार्य मिल गया। यहाँ वे 1955 तक रहे। तत्पश्चात आल इंडिया रेडियो के सहायक संपादक (हिंदी समाचार विभाग) पद पर आपकी नियुक्ति हो गई। इस पद पर वे दिल्ली में वे 1960 तक रहे। सन 1960 के बाद वे दिल्ली से लखनऊ रेडियो स्टेशन आ गए। 1964 में लखनऊ रेडियो की नौकरी के बाद वे कुछ समय भोपाल एवं रेडियो में भी कार्यरत रहे। सन 1964 में जब दिनमान पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ तो वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' के आग्रह पर वे पद से त्यागपत्र देकर दिल्ली आ गए और दिनमान से जुड़ गए। 1982 में प्रमुख बाल पत्रिका पराग के सम्पादक बने। नवंबर 1982 में पराग का संपादन संभालने के बाद वे मृत्युपर्यन्त उससे जुड़े रहे। निधन– 23 सितंबर 1983 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

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