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भारत महिमा - जयशंकर प्रसाद

भारत महिमा – जयशंकर प्रसाद

हिमालय के आँगन में उसे
प्रथम किरणों का दे उपहार
उषा ने हँस अभिनंदन किया
और पहनाया हीरक हार।

जगे हम, लगे जगाने विश्व
लोक में फैला फिर आलोक
व्योम–तम–पुंज हुआ तब नाश
अखिल संसृति हो उठी अशोक।

विमल वाणी ने वीणा ली
कमल–कोमल–कर में सप्रीत
सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे
छिड़ा तब मधुर साम–संगीत।

हमारे संचय में था दान
अतिथि थे सदा हमारे देव
वचन में सत्य, हृदय में तेज
प्रतिज्ञा में रहती थी टेव।

वही है रक्त, वही है देश
वही है साहस, वैसा ज्ञान
वही है शांति, वही है शक्ति
वही हम दिव्य आर्य संतान।

जिये तो सदा इसी के लिये
यही अभिमान रहे, यह हर्ष
निछावर कर दें हम सर्वस्य
हमारा प्यारा भारतवर्ष।

∼ जयशंकर प्रसाद

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