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नृसिंह जयंती - Narsingh Jayanti in Hindi

नृसिंह जयंती – Narsingh Jayanti in Hindi

पदम पुराण के अनुसार दिति और ऋषि कश्यप जी के दो पुत्र हिरण्यकश्य (हिरण्याकशिपु) और हिरण्याक्ष हुए। यह दोनों बड़े बलशाली एवं पराक्रमी थे तथा वह सभी दैत्यों के स्वामी थे। हिरण्याक्ष को अपने बल पर बड़ा अभिमान था क्योंकि उसके शरीर का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं था। उसने अपनी हजारों भुजाओं से समस्त पर्वत, समुद्र, द्वीप तथा प्राणियों सहित सारी पृथ्वी को उखाड़ कर सिर पर रख लिया तथा रसातल में चला गया, जिससे सभी देवता भयभीत होकर त्राहि-त्राहि करने लगे तथा वह भगवान नारायण की शरण में गए।

भगवान ने तब वाराह रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष को कुचल दिया। जिससे वह मारा गया तथा भगवान ने धरती को पुन: शेषनाग की पीठ पर स्थापित करके सभी को अभयदान दिया।

अपने भाई की मृत्यु से दुखी हुए हिरण्यकशिपु ने मेरू पर्वत पर जाकर घोर तपस्या की तथा सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि उसे सारी सृष्टि का कोई मनुष्य अथवा शूरवीर मार ही न सके, वह न दिन में मरे तथा न ही रात को, वह न किसी छत के नीचे मरे तथा न ही खुले आकाश में तथा न ही धरती पर मरे तथा न ही किसी वस्तु पर गिरकर, कोई अस्त्र उसे काट न सके तथा आग उसे जला न सके। यहां तक कि साल के 12 महीनों में से किसी भी महीने में न मर पाऊं।

ऐसा वरदान पाकर हिरण्यकशिपु स्वयं को अमर मानने लगा तथा और अधिक अहंकार में आ गया और अपने आप को भगवान कहने लगा। दैत्य हिरण्यकशिपु के घर प्रहलाद का जन्म हुआ। वह बालक भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव रखता था जो उसके पिता को बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने अनेकों बार पुत्र को समझाया कि वह भगवान विष्णु की नहीं बल्कि उसकी पूजा करें। उसने अपनी सारी प्रजा को भी तंग कर रखा था। उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति किसी भगवान की पूजा अर्चना नहीं कर सकता था। जब हिरण्यकश्य को अपने राज्य में किसी के बारे में ऐसी सूचना भी मिलती थी तो वह उसे मरवा देता था। पुत्र मोह के कारण उसने प्रह्लाद को बहुत समझाया परंतु जब वह न माना तो उसने अपनी बहन होलिका, जिसे वरदान था कि आग उसे जला नहीं सकती के साथ मिलकर मारने की कोशिश की।

होलिका अपने भतीजे को मारने के लिए दहकती हुई आग में बैठ गई परंतु कहा जाता है की “जाको राखे साईंयां मार सके न कोई” की कहावत चरितार्थ हुई और भक्त प्रहलाद का बाल भी बांका न हुआ तथा होलिका जलकर राख हो गई। बहन के जल जाने के बाद तो हिरण्यकश्य गुस्से से अत्याधिक आग बबूला हो गया तथा उसने प्रहलाद को मारने के लिए कभी पर्वतों से गिराया तथा कभी हाथी के पांव तले रोंदवाया और सांड़ों के आगे फैंकवाया। उसने प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए परंतु मारने वाले से ज्यादा बलवान है बचाने वाला।

हिरण्यकशिपु को हर समय अपने पुत्र से चिंता रहने लगी कि कहीं उसके राज्य के लोग भी भगवान की भक्ति में न लग जाएं। सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापक ईश्वर जब किसी पापी के बढ़ रहे पापों एवं अत्याचारों का घड़ा भरते देखते हैैं तो किसी न किसी रुप में प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा अवश्य करते हैं। अपनी सभा में बैठे हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए एक खंबे पर मुक्का मारते हुए कहा कि क्या इस खंबे में भी भगवान हैं तो बुलाओ।

भक्त प्रह्लाद ने नारायण को पुकारा तो ब्रह्मा जी के दिए हुए वचन को पूरा करने के लिए भगवान विष्णु खंबे में से नृसिंह अवतार लेकर प्रकट हो गए। उन्होंनेे हिरण्यकशिपु को उठा लिया तथा घर की दहलीज पर ले आए उन्होंने उसे अपनी गोद में लिटा लिया तथा शेर मुख तथा पंजों के नाखूनों से चीर कर उसे मार दिया। उसके दिए वचन को पूरा करते हुए भगवान ने कहा कि इस समय न दिन है न रात अर्थात संध्या का समय है, न मैं नर हूं न पशु, अर्थात आधा शरीर पशु तथा आधा मनुष्य का है तभी उनका नाम नृसिंह पड़ा।

साल के 12 महीनों में से किसी भी महीने में न मरने का वचन लेने वाले हिरण्यकशिपु को मारने के लिए भगवान ने पुरषोत्तम अर्थात अधिक मास बनाया। भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर दुष्ट, पापी एवं अहंकारी हिरण्यकशिपु को मार कर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करी। सभी ने मिलकर प्रभु की स्तुति की तथा भगवान ने नृसिंह रूप में ही सभी को आशीर्वाद दिया।

महादैत्य के मारे जाने से सबको बड़ा हर्ष हुआ। देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और देवगणों ने प्रभु की स्तुति गाई। दक्षिण भारत में हर साल नृसिंह जयंती पर वैष्णव सम्प्रदाय के लोग भक्तों की रक्षा करने वाले भगवान नृसिंह जी की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। जो लोग प्रतिदिन इस कथा को सुनते हैं वह सब पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त करते हैं।

~ वीना जोशी, जालंधर

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