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महाराणा प्रताप की रानी - वीर राजपूत नारी की लोक कथा

महाराणा प्रताप की रानी – वीर राजपूत नारी की लोक कथा

वर्ष 1576 ई० में हल्दी घाटी का विकट युद्ध हुआ। यदि राणा चाहते तो अपने भाले की नोक से बाबर के घर का चिराग गुल कर देते, शहजादा सलीम के हाथी पर चेतक अपने अगले चरण रख चुका था। राजपूतों ने बड़ी वीरता दिखायी, मान का अभिमान विजयी हुआ। राणा के स्वामिभक्त सरदार माना ने उनकी जान बचायी। अकबर के शत्रु को प्रश्रय देना आसान काम नहीं था; और फिर इतनी शक्ति और गौरव ही किस में रह गया था, जो मेवाड़ के सिसोदिया परिवार को आश्रय देता। महाराणा की प्रियतमा ने कहा, ‘प्राणाधार! पहाड़ियाँ और जंगल ही हमारा राज्य है, भील ही हमारी प्रजा हैं। उदयपुर, कुम्हलनेर आदि के राज्य महलों से भी अधिक सुख हमें जंगलों में मिलेगा। स्वाधीनता के सैनिकों के लिये जंगल ही मंगल का स्थान है।’ राणा चल पड़े; उनके पीछे-पीछे कुमार अमर सिंह, उनकी प्यारी राजकुमारी और मेवाड़ की महारानी थी। राणा ने सारे साधन नष्ट कर दिये, जिससे मुगल उन उन सामरिक वस्तुओं का उपयोग कर मेवाड़ की स्वाधीनता को जर्जर न कर सके। स्वाधीनता का व्रत बहुत ही कठोर होता है। राणा मेवाड़ की पवित्र भूमी से विदा ले रहे थे; सामने निर्जन मैदान था, विदेशी आक्रमण ने राजस्थान को मरुस्थान बना दिया था। रानी ने कहा, ‘आर्यपुत्र! इसी तरह महाराज राम ने भी तो विधर्मियों और राक्षसों के दमन के लिये चौदह साल तक वनवास किया था।’ महाराणा ने रानी की और देखा, उनकी आँखों में आनन्द और विषाद जल बनकर उमड़ आया। बाप्पा रावल के वंशधर ने कहा, ‘प्रिये! जगजन्नी सीता भी तो थीं।’

वीर-दम्पति ने स्वाधीनता का कठिन व्रत लेकर अपनी माता का दूध सफल कर दिया उन्होंने पचीस साल तक शक्तिशाली साम्राज्य का सामना किया; मुगलों की छावनियों पर छापा मारना, मुगल सैनिकों की आँखों से बात-ही-बात में ओझल हो जाना, रानी और राजकुमार के लिये भोजन सामग्री एवं फल-फूल का प्रबन्ध करना, एक स्थान से दुसरे स्थान पर जंगलों में मारे-मारे फिरना ही उनका काम था। उनका दृढ़ निश्चय था कि बाप्पा रावल का वंशज कभी यवनों और विधर्मियों के सामने मस्तक नहीं झुकायेगा और न उनसे रोटी-बेटी का सम्बन्ध करेगा। महाराणा प्रताप और उनकी राजरानी का वीरतापूर्ण इतिहास मेवाड़ के कण-कण में विद्धमान है। राजरानी कभी नहीं चाहती थीं कि जिस राणा साँगा का आतंक हिमालय से रामेश्वर तक छाया हुआ था, उसकी वीर सन्तान कभी यवनों की दस्ता स्वीकार करे। राजमहल में पराधीन रहकर दिया – बाती करना रानी को असह्य था, वह तो अपने पति के साथ जंगल में रहकर स्वाधीनता-भवानी की आरती उतरने में गौरव का अनुभव करती थी। रानी कहा करती थी कि दुःख आएंगे चले जायंगे; लेकिन मर्यादा तथा धर्म के साथ गौरव और कीर्ति तो अमिट ही रहेंगे।’

रानी को बड़ी-बड़ी विप्तियों और असुविधाओं का सामना करना पड़ा। कई बार तो उसने भोजन तैयार कर पति और कुमार के सामने पत्तल और दोने रखे ही थे कि दुश्मन के सैनिकों के आ जाने की आशंका से उन्हें छोड़ देना पड़ा। उपवास-पर-उपवास होते थे, पर स्वाधीनता की मस्ती तो कुछ और ही थी। एक बार रानी ने घास की रोटी तैयार की। रोटी के आधे-आधे टुकड़े का हिस्सा लगता था; राणा की कन्या रोटी खानेवाली ही थी कि जंगली बिलार ने छीन ली। राजमहल में रहनेवाली, फूलों की सेज पर सोने वाली सन्तान निर्जन वनस्थली में घास की आधी रोटी भी न पा सकी। साध्वी रानी ने लडकी की चीख अनसुनी कर दी। वह नहीं चाहती थी कि इन छोटी-छोटी बातों से पति की चिन्ता बढायी जाए; लेकिन यह छोटी बात नहीं थी। राजकुमारी घास की रोटी भी न खाने पायी, क्या यही स्वाधीनता-व्रत था। क्या इसीलिये राणा ने मेवाड़ की पवित्र भूमि से विदा लेने का निश्चय किया था? वह नरसिंह देख रहा था – जिस पत्थर से कलेजे पर साम्राज्य का फौलादी पंजा आघात न कर सका, जिसपर पराधीनता की काली लकीर मान का फूफा अकबर न खींच सका, वह इस दुःख के वज्रपात से चूर-चूर हो गया। राणा ने देखा आसमान काला पड़ गया, जमीन थर-थर काँपने लगी; राणा का धैर्य विचलित हो उठा।

वीरहृदया रानी ने अपने प्रियतम की मानसिक स्थिति जान ली; फिर भी उसे विश्वास था हिमालय भले ही झुक जाए, सात महासागर भले ही सूख जायें, लेकिन राणा, जिनकी नसों में पद्मिनी का खून बह रहा है, जिनके अंग-अंग में राणा साँगा की वीरता भरी है, कभी विचलित नहीं होंगे। प्रताप ने कहा, ‘प्राणेश्वरी! अब तुम लोगों का दुःख ये आँखें न देखेंगी। मैंने अच्छी तरह विचार कर देख लिया है कि अकबर से संधि कर लेने में ही हित है।’

महाराणा प्रताप की रानी - वीर राजपूत नारी की लोक कथारानी ने पति की ओर देखा, उसने कहा – ‘प्राणेश्वर ! क्या इसी दिनों को देखने के लिये हमलोगों ने स्वाधीनता – व्रत लिया था? जिस समय आपका सन्धिपत्र शाही दरबार में पहुँचेगा, आपकी वीरता और साहस की अस्तुति करने वाला अकबर क्या कहेगा ! शाही जनानखाने से अपने उद्धार की आशा लगाकर बैठी रहनेवाली राजपूतानियों की क्या दशा होगी, क्या अपने इसपर विचार कर लिया? जिस समय बैरम का स्वाभिमानी पुत्र रहीम खानखाना सुनेगा कि आपने सन्धि की बातचीत चलायी है तो उसकी वाणी अकबर के सामने किस तरह खुलेगी? रहीम नवाब तो आपकी वीरता का गीत गाया करता है। वह तो बाबर के वंशज से कहता है कि दुनिया की तमाम वस्तुएँ अस्थिर हैं, सम्पत्ति और राज्य नष्ट हो जायेंगे; लेकिन वीर का नाम अमर रहता है। पुत्तु (प्रताप) ने सब कुछ त्याग दिया; लेकिन उसने किसी के सामने कभी मस्तक न झुकाया, उसने अपने कुल की मान-मर्यादा अक्षुण्ण रक्खी। क्या आपको स्मरण नहीं है कि हल्दीघाटी की युद्ध-समाप्ति पर शक्तिसिंह ने अपनी जान की बजी लगाकर भी ‘हो, नीला घोडा रा असवार’ कहकर आपको पुकारा था? यदि वह जानते कि मेवाड़ का सूर्य विपत्तियों के बादल में छिप जायगा, स्वाधीनता पर ग्रहण लग जायगा, तो कभी आपकी सहायता न करते। शहजादा सलीम उन्हें ताना मारेगा।’

प्रताप ने कहा, ‘राजरानी जंगल में रहकर तुम राजरानी नहीं बन सकती। अमर, उसकी पत्नी और राजकन्या सुख की रोटी नहीं खा सकते। प्रताप नहीं देख सकता कि उसके असहाय और अनाथ बच्चों पर जंगल के सिंह और भेड़िये हमला करें। राजपरिवार के लिये राजमहल ही उचित निवास स्थान है।’

रानी का गला भर आया, राजपूतनी की देह में आग लग गयी, चेहरा तमतमा उठा। उस पर उस वीर क्षत्राणी ने कहा – ‘मेवाड़ के राजमहलों पर आग लगे यदि वे दुष्ट यवनों की पराधीनता की बेड़ी में जकड़ने की साधन हैं। उस राजत्व का नास हो, जो दासता में बांधकर मेवे-मिष्टान और दूध-मलाई खिलाकर जाती गौरव नष्ट कर दे। कौन कहता है कि जंगल के भेड़िये और सिंह राणा की सन्तान पर आक्रमण करेंगे? उन्होंने तो आपसे नरसिंह की अधीनता उसी दिन स्वीकार कर ली, जिस दिन आपने पदार्पण किया। धर्म तथा मर्यादा के पुजारियों के लिये घास की रोटी मीठी है, उन्हें पकवान नहीं चाहिये। क्या अपने अभी तक नहीं समझा कि आपके इस निश्चय ने सती पद्मिनी, पन्ना धाय, राजरानी मीरा और महाराणा साँगा के हृदय में पितृलोक में कितनी बड़ी हलचल पैदा कर दी होगी! वे चिन्तित हो उठे होंगे कि ऐसा न हो कहीं मेवाड़ का गौरव डूब जाय! क्या आपने मानसिंह से नहीं कहा था कि जिस राजपूत ने तुर्कों और विधर्मियों से रोटी-बेटी का सम्बन्ध किया है, उसके साथ भोजन करने में या उसका स्वागत-सत्कार करने में मेवाड़ का अधिपति अपना अपमान समझता है? राणा को निश्चय से डिगाना आसान बात नहीं थी। जिसे आसफखां की विशाल सेना मेवाड़ की थर्मोपली में विचलित कर सकी, जिसे अकबर अपने वंश में न कर सका, उसकी प्रतिज्ञा खिलवाड़ थोड़े ही थी। रानी ने पति की इच्छा पूर्ति में अपना सुख समझा। आर्य नारी पति को प्रसन्न रखने के लिये बड़ी-से-बड़ी विपत्तियों का सामना कर सकती है। रानी साध्वी और पतिव्रता थी। पति जो कुछ भी करता; उसके लिये हितकर ही था।

सन्धि पत्र भेज गया। बीकानेर के राजा के भाई महाराज पृथ्वीराज ने पत्र पर संदेह प्रकट किया। उसने भरे दरबार में कहा कि सिसोदिया-कुल अपनी स्वाधीनता कभी नहीं इस तरह नीलाम पर नहीं चढ़ा सकता, उसने राणा को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा। राणा का विचार बदल गया और थोड़े ही दिनों में उसने अपने राज्य का अधिकांश भाग अकबर से छीन लिया।

आर्य नारियों ने पति के सुख-दुःख में साथ-साथ रहकर सदा हाथ बँटाया है। महारानी सच्चे अर्थ में राणा की सहधर्मिणी थी। उसने अर्धांगिनी का कर्तव्य-पालन किया।

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